झरिया : कहानी कोयले के अभिशप्त कस्बे की

झरिया को आप कोयले से अभिशप्त और बर्बाद हुए क़स्बे का नाम भी दे सकते हैं, जो झारखंड के धनबाद जिले में स्थित है। झरिया में वायु प्रदूषण कोई नई बात भी नहीं है। कोयले ने कितनी बर्बादी की है, कितने लोग मरे हैं और कितना जंगल तबाह हुआ है, इसके ठोस आँकडें नहीं हैं और शायद अब सब कुछ इतिहास हो चुका है। अब तो सबके सपने कोयले की कालिख में कहीं मटमैले तो कहीं राख हो गए हैं। सैकड़ों सालों से जारी कोयले की खुदाई ने यहाँ के जीवन को भी अंदर से खोखला कर दिया है। उम्मीद है कोई सरकार कभी आएगी जो पोलियो जैसे अभियान की तर्ज़ पर झरिया के घर-घर जाकर प्रदूषण मापने का भी अभियान चलाए। अगर वह झरिया के घरों में और लोगों के सीने में फंसे प्रदूषण का आंकलन करती तो पता चल पाता कि ये लोग अब कितने बदहाल व जीर्ण हो चुके है, जिनका पूरा शरीर प्रदूषणमय हो चुका है।

आप झरिया को ‘पॉल्युशन कैपिटल ऑफ़ इंडिया’ भी कहे तो कोई विवाद नहीं होगा, क्योंकि झरिया भारत के सबसे बड़े कोयला खदानों में शुमार है। झरिया कोल फील्ड और इसके आसपास का इलाक़ा बीते सौ सालों से ज़मीन के अंदर लगी आग से भी सुलग रहा है और जमीन के बाहर हवा में भी घुल कर प्रदूषण फैला रहा है। झरिया और इसके आसपास के इलाक़े बीते कई दशक से भयंकर वायु प्रदूषण की चपेट में हैं, जो कई गंभीर बीमारियों का कारण बनते हैं और रोज़ाना जन-जीवन को प्रभावित कर रहे हैं।

बीते 70 सालों के देश की विकास यात्रा में कोयले ने भारत के आर्थिक विकास में बड़ा योगदान दिया है। धनबाद के झरिया में सबसे बेहतर क्वालिटी के कोयले का सबसे बड़ा भंडार है और सबसे ज्यादा कोयले के साथ जीने और मरने वाले लोग भी यही हैं। कोयला खदान के आसपास वाले इलाक़े की जमीन के अंदर की आग ने यहां की हवा, पानी और मिट्टी को प्रदूषित कर दिया है, जो धुएं की शक्ल में यहां सल्फ़र डाइऑक्साईड, कार्बन डाइऑक्साइड और आर्सेनिक जैसी जानलेवा गैसों और धूलकण से लोगों में सांस और दिल से संबंधित कई बीमारियां पैदा कर रहे हैं। विरोधाभास ही है कि दस लाख से ज्यादा की आबादी वाले इस इलाक़े में कोयले ने जितना रोज़गार दिया है, उससे बड़ी आबादी को वायु प्रदूषण से होने वाली बीमारियाँ भी दी हैं।

देशभर में जहाँ-जहाँ कोयले की खदान है, उन इलाक़ों के आसपास में रहने वाले लोग लंबे समय से सुरक्षा और रोज़गार को लेकर संघर्ष और माँग करते रहे हैं. लोग मजबूरीवश इन इलाक़ों में रह रहे हैं और कोयला श्रमिक इन आग लगी खानों में जान पर खेल कर उतर रहे हैं ताकि पेट पाल सके। उनके पेट की आग उन्हें मौत से खेलने के लिए मजबूर करती है। फिर भी सरकार इन इलाक़ों की सच्चाई से मुँह मोड़े हुए नज़र आती है और ऊर्जा नीतियों में यहाँ के लोग ग़ायब होते हैं। 

कोयले के इतर हमारी ऊर्जा नीति कैसी हो, इस मुद्दे पर बहस होने लगी है। बीते सालों में ऊर्जा उत्पादन की रूपरेखा को लेकर कुछ सार्थक बदलाव भी हुए हैं। दुनिया भर में कोयले की ऊर्जा पर निर्भरता को कम कैसे किया जाए, इस पर मजबूत बहस और नए प्रयोग होने लगे हैं, यूरोप के कई बड़े देश जर्मनी, स्वीडन और नार्वे ने कोयले के खदान बंद किए हैं, कोयले के ऊर्जा घरों को भी बंद कर दिया है और बेहतर भविष्य और विकल्प के लिए सौर ऊर्जा की ओर बड़ा क़दम उठाया है।

जर्मनी, स्वीडन और नार्वे जैसी देशों की सरकारों ने देश के आर्थिक विकास के लिए अपनी आबादी के बड़े हिस्से को कोयले की निर्भरता से अक्षय ऊर्जा की ओर मोड़ा है। इन देशों ने कोयले की खदानों और कोयले से चलने वाली ऊर्जा घरों की कहानी बदल दी है। अब उन इलाक़ों में सौर ऊर्जा के ज़रिए ऊर्जा रोज़गार और बिजली की ज़रूरतों की पूर्ति की जा रही है।

ऐसे समय में ज़रूरत है कि भारत सरकार झरिया को लेकर एक सततशील प्रयास करने की ओर बढ़े और बदहाल हो चुके झरिया को लेकर कोयले से दूर स्वच्छ व सुरक्षित ऊर्जा की ओर रुख करे। झरिया जो आज का ‘कोल हब’ (कोयला भंडार) है, उसे सरकार आने वाले समय में सौर ऊर्जा का केंद्र बनाने की एक नई पहल करे और लोगों के साफ़-सुथरे जीवन की कल्पना को साकार करने की ओर एक क़दम बढ़ाए, ताकि आने वाले कुछ सालों में झरिया इतिहास के पन्नों पर कोयले के अभिशाप से मुक्त होकर पर्यावरण संरक्षण के लिए भी जाना जाए।

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