नदियां कर रहीं पुकार, कब होगा हमारा उपचार!

पूरी दुनिया में सबसे आसानी से उपलब्ध प्राकृतिक संसाधन अगर कोई है तो वह है जल या पानी। इसकी महत्ता इसी बात से है कि यह मानव व जीव जगत के लिए जीवनदायिनी और संजीवनी स्रोत है। लेकिन यह भी सच है कि अगर सबसे प्रदूषित कोई नैसर्गिक वस्तु है तो वह पानी ही है और इसके पीछे मानव जनित कारण सर्वप्रमुख है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (World health Organization) में एशिया और अफ्रीका में सबसे ज्यादा जल प्रदूषण और जल जनित बीमारियों की पहचान की है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार भारत में अधिकतर लोग मल युक्त जल का उपयोग अपने दैनंदिन के उपयोग में कर रहे हैं। भारतीय परंपरा में नदियों को माता व पापनाशिनी का दर्जा दिया गया है, लेकिन नदियों में इतने ‘पाप’ धो चुके हैं, कि ये गंदगी, कचरा और मल-मूत्र के नालों में तब्दील हो गई हैं। भारत में सतही जल (Surface Water) और भूजल (Ground Water) के प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण ‘अनट्रिटेड सीवेज’ (untreated sewage) यानी बिना समुचित व्यवस्था के बहाया गया गंदा पानी है, जिसके पीछे लोगों द्वारा खुले में शौच से कहीं ज्यादा सरकारी, औद्योगिक व घरेलू नाले यानी सीवेज का लापरवाही व गैर जिम्मेदाराना ढंग से नदियों व अन्य जलाशयों में छोड़ देना है।

आंकड़ों के आईने में जल प्रदूषण

गंगा को मैली करने के लिए 20 फीसदी उद्योग और 80 फीसदी शहरों से निकली मानव मल व कचड़ा ढोने वाली ‘सीवेज लाइनें’ दोषी हैं। दिल्ली की यमुना को कोई नदी नहीं मानता, बल्कि वह विषैली नाला है, क्योंकि यह दुनिया के सबसे प्रदूषित दस नदियों में शुमार होती है। यमुना, गंगा, साबरमती, ओशीवारा और दामोदार भारत की पांच सर्वाधिक प्रदूषित नदियां हैं। प्रदूषण का आलम यह है कि 70 प्रतिशत भारतीय नदियां जानलेवा स्तर तक प्रदूषित हैं। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (Central Pollution Control Board) के अध्ययन के मुताबिक वर्ष 2009 में जहां 121 नदियां प्रदूषित थीं, वह संख्या 2015 में 275 हो गईं।

शहरीकरण के बेतरतीब विस्तार, घरेलू व उद्योगों के उत्सर्जित विषैले पदार्थों के समीप के स्रोतों में बहा देने से जल प्रदूषित होता है। ‘वाटर ऐड’ (Water Aid) संगठन के अनुसार भारत का 80 प्रतिशत सरफेस वाटर प्रदूषित है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार 900 शहरों का 63 प्रतिशत गंदा पानी करीब 62 अरब लीटर बिना उपचार व शुद्धीकरण प्रयासों के सार्वजनिक जल स्रोतों में छोड़ दिया जाता है। रिपोर्ट के अनुसार देश के 400 से ज्यादा जिलों में भूजल के प्रदूषित होने की बात सामने आई है और सालाना 4 करोड़ से अधिक लोग जल जनित रोगों का शिकार होते हैं, जिनमें डायरिया, पीलिया, टाफायड, हेपेटाइटिस आदि प्रमुख हैं। देश भर में दूषित जल पीने वालों का आंकड़ा 50 करोड़ से ज्यादा है।

जल प्रदूषण का समाज व स्वास्थ्य पर असर

दिल्ली की यमुना के अलावा चेन्नई की कोकम, मुंबई की मीठी व उल्हास नदी को ‘डेड जोन’ (Dead Zone) मान लिया गया है, जिनके पानी में ऑक्सीजन का स्तर इतना कम है कि मछलियां नहीं जीवित रह सकती। जल संसाधन मंत्रालय की एक समिति की एक रिपोर्ट, जो सितंबर 2016 में प्रस्तुत हुई थी, के अनुसार देश के 10 राज्यों के 89 जिलों में आर्सेनिक और 20 राज्यों के 317 जिलों में फ्लोराइड एवं 20 राज्यों के 387 जिलों में नाइट्रेट मात्रा वहां के पानी में पाई गई थी। केंद्रीय पेयजल व स्वच्छता मंत्रालय के आकलन के अनुसार देशभर के करीब 66700 इलाकों में पेयजल पीने लायक नहीं है, क्योंकि उसमें आर्सेनिक और फ्लोराइड खतरनाक स्तर पर है। माइनिंग के कारण पैदा हुए केमिकल वेस्ट यानी रासायनिक कचड़े आदि से जल में हानिकारक पदार्थ जमा होते हैं। पानी में फ्लोराइड, आर्सेनिक, लोहा व नाइट्रेट जैसे तत्वों और धातुओं की मात्रा बढ़ने से जल जनित रोगों के अलावा त्वचा संबंधी रोग, विकलांगता, और कैंसर जैसे रोग बढ़ रहे हैं।

जिन राज्यों में प्रदूषित पानी की समस्या सबसे ज्यादा है, उनमें पश्चिम बंगाल, असम और राजस्थान का नाम प्रमुख है, मुंबई, कोलकाता, दिल्ली में पेयजल की शुद्धता भयावह समस्या है। राजस्थान में 70 लाख से ज्यादा लोग दूषित पानी पीते जिसमें फ्लोराइड व नाइट्रेट की मात्रा बहुत ज्यादा है। असम में 17 लाख लोगों को आर्सेनिक घुला पानी पीना पड़ रहा है। पश्चिम बंगाल में करीब पौने दो करोड़ लोगों को कमोबेश ऐसे ही दूषित पानी पर गुजर-बसर करना पड़ता है। झारखंड के रांची व धनबाद, हजारीबाग, जमशेदपुर के जलस्रोतों में आर्सेनिक व फ्लोराइड के अलावा माइनिंग के कारण रासायनिक अवशेष पाये गये हैं, जिनसे विकलांगता आदि के सामने बढ़ रहे हैं।

समाज में पानी की अनिवार्यता व इसको बचाए रखने को लेकर कोई विवाद नहीं है, लेकिन जल प्रदूषण में मानवों की कारगुजारियों का आलम यह है कि इससे सभ्यतागत संकट भी पैदा हो रहा है। लोक विमर्श में वाटर वार (Water War) यानी पानी के लिए युद्ध की बात कोई तीर-तुक्का नहीं है, बल्कि आसन्न संकट का संकेत है। भारत ही नहीं विकासशील देशों की विशाल आबादी को स्वच्छ व सुरक्षित पेयजल सुलभ नहीं है, जिसके पीछे जितनी सरकारी प्रतिष्ठान, नीतिगत व नियामकीय संस्थाओं की विफलता हैं, उतनी ही आम लोगों की नाकामी और अदूरदर्शिता की भी, क्योंकि एक समय जल जितना सर्वसुलभ रहा करता है, उसकी कमी से समुदायों व देशों के बीच तनाव आज की सच्चाई बनती जा रही है। क्या हम इस प्राकृतिक धरोहर को संजो रख पाएंगे? इसका जवाब हम सबके प्रयास के बीच में ही है।

आगे पढ़िए: जल प्रदूषण पर इंफोग्राफिक्स ( Weblink)

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