हमारी ज़िंदगियों को खोखला कर रहा वायु प्रदूषण

बाहरी वायु प्रदूषण से बीमारियों का गढ़ बनता भारत

प्रो अरविन्द कुमार (चेस्ट सर्जन)चेयरमैन, सेंटर फॉर चेस्ट सर्जरी, सर गंगा राम होस्पिटल, नई दिल्ली फाउंडर, लंग केयर फाउंडेशन

 

 

वायु प्रदूषण पिछले कुछ सालों से पूरे विश्व में बड़ी चर्चा का विषय बना हुआ है। आजकल प्रदूषण हमारी ज़िन्दगी का हिस्सा बन गया है चाहे वह प्रदूषित पानी हो, खाना हो या अन्य रोज़ मर्रा की हमारी ज़रूरतों की कोई चीज़। वायु प्रदूषण को लेकर इतना हंगामा क्यों हो रहा है?

शुद्ध पानी के लिए हम बाज़ार से पानी की बोतल खरीद सकते है परन्तु शुद्ध हवा के लिए हमारे पास कोई अन्य स्त्रोत नहीं है। वायु प्रदूषण का बुरा प्रभाव बेजुबान पशु-पक्षियों और पेड़ पौंधों पर भी होता है।

2012 में प्रकाशित हुई वर्ल्ड हेल्थ आर्गेनाइजेशन (World Health Organization) की रिपोर्ट के अनुसार, 70 लाख लोगों की मृत्यु का कारण वायु प्रदूषण है यानी विश्वभर में हर 8 मृत्यु में से एक मृत्यु वायु प्रदुषण के कारण होती है। यह पिछले कुछ वर्षों के अनुमानित आंकड़ों से दुगने है और यह पुष्टि करता है कि वायु प्रदूषण अब दुनिया का ‘सबसे बड़ा एकल पर्यावरण स्वास्थ्य जोखिम (Single largest environmental Health threat)’ है। वायु प्रदूषण को कम करने से लाखों जीवन बचा सकते हैं। बाहरी वायु प्रदूषण (ambient air pollution) से संबंधित लगभग 72% मौत की वजह ‘इस्किमिक’ हृदय रोग और ‘स्ट्रोक’ (ब्रेन अटैक) जबकि 28% मृत्यु श्वसन संबंधी बीमारियों जैसे ‘क्रोनिक ऑब्सस्ट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज’ (COPD) (14%) और फेफड़ों के कैंसर (14%) के कारण हुई थी।

डब्ल्यूएचओ की अंतर्राष्ट्रीय एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर (आईएआरसी) ने 2013 में एक निष्कर्ष निकाला है कि बाहरी वायु प्रदूषण मानव के लिए कारसिनोजेनिक (Carcinogenic) है, यानी ऐसे पदार्थ जो कैंसर का कारण बनते हैं। बाहरी प्रदूषण में कुछ ऐसे तत्व होते है, जिनसे कैंसर खास तौर पर फेफड़ों के कैंसर के रोगियों की संख्या बढ़ रही है। वर्तमान स्थिति में फेफड़ों का कैंसर केवल धूम्रपान करने वालों तक ही सीमित नहीं है, आज कल यह धूम्रपान न करने वालों में भी ज्यादा से ज्यादा पाया जाने लगा है।

टाटा मेमोरियल अस्पताल, मुंबई में 2012 में फेफड़ों के कैंसर की एक रिसर्च के अनुसार 52 प्रतिशत रोगी गैर धूम्रपान करने वाले थे। एम्स, दिल्ली के एक अध्ययन में प्रकाशित 2013 की रिपोर्ट में 32% फेफड़े के कैंसर रोगी गैर धूम्रपान करने वाले थे।

क्या ये तथ्य काफी नहीं है इस समस्या की गहराई को समझने के लिए? वायु प्रदूषण दीमक की तरह हमारी ज़िंदगियों को खोखला कर रहा है। हम कब तक इसी प्रकार से अपनी जिम्मेदारियों से पीछे भागते रहेंगे? वायु प्रदूषण न केवल आज बल्कि हमारे आगे आने वाली पीढ़ी के लिए भी बहुत गंभीर समस्या है और हमने अभी से कुछ प्रयास शुरू नहीं किए तो सोने की चिड़िया कहलाने वाला भारत केवल बीमारियों का गढ़ बन जाएगा।

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