भारत में खनन की सच्चाई, मानो परिवार का पुश्तैनी सोना लुटा रहे हों

  • राहुल बसु

यह सिद्धांत कि अर्थव्यवस्था “टिकाऊ” होनी चाहिए- हम अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए भावी पीढ़ियों की क्षमता से समझौता नहीं कर सकते हैं- यह सवाल से परे है। जलवायु परिवर्तन और खपत का उच्च स्तर पहले से ही इस धरती के भावी पीढ़ियों के समक्ष आने वाले खतरों को लेकर आगाह करता है। इंटरजेनरेशनल इक्विटी (अंतरजनपदीय समानता) का सिद्धांत हमारे लिए यह सुनिश्चित करने के लिए जरूरी है कि हम आने वाली पीढ़ियों को उतना ही सुनिश्चित करें जितना हमें मिला है।

अगर हम इंटरजेनरेशनल इक्विटी का पालन करने में सफल होते हैं, तो हमारे बच्चे कम से कम हमारे जैसे रह सकेंगे। यदि हम एक वसीयत भी छोड़ देते हैं तो वे हम से बेहतर रह पाएंगे।

 

जो कुछ हमें विरासत में मिला है अगर हम उसका इस्तेमाल बिना सोचे-समझे और आने वाली पीढ़ियों को ध्यान में रखकर नहीं करेंगे तो आने वाले दिनों में पूरी दुनिया प्राकृतिक संसाधनों के लिए तरस जाएगी। जैसे कोई नशेड़ी अपने नशे की लत को पूरा करने के लिए परिवार का सोना बेच देता हो।

 

यह कैसे अरक्षणीय है?

भारत की राष्ट्रीय खनिज नीति 2019 बताती है: ”प्राकृतिक संसाधन, जिसमें खनिज भी शामिल हैं, एक साझा विरासत है जहां राज्य लोगों की ओर से ट्रस्टी है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि आने वाली पीढ़ियों को विरासत का लाभ मिले।” एक ट्रस्टी/प्रबंधन का प्राथमिक उद्देश्य प्राकृतिक संसाधनों के साझा विरासत, ट्रस्ट के कोष को बनाए रखना है।

तेल, गैस और खनिजों का निष्कर्षण प्रभावी रूप से इस विरासत की बिक्री है, जिसमें रॉयल्टी और अन्य आय के साथ निकाले गए खनिज संपदा के बदले में भुगतान माना गया है।

दुर्भाग्य से, सरकारें हर जगह खनिज बिक्री से प्राप्त धनराशि को राजस्व या आय के रूप में मानती हैं। विरासत में मिली संपत्ति को इस तरह बेचना एक बड़ी गलती है जो वास्तविक लेनदेन को छिपाता है।

इसका परिणाम यह हुआ है कि सरकारें खनिजों को उनकी वास्तविक कीमतों से काफी कम में बेचती हैं और लॉबिंग, राजनीतिक चंदे एवं भ्रष्टाचार इसके मुख्य कारण हैं। उदाहरण के लिए, वेदांता की वार्षिक रिपोर्टों से यह अनुमान लगाया गया है कि आठ सालों (2004-2012) में, निष्कर्षण लागत और निष्कर्षक के लिए एक उचित लाभ के बाद गोवा ने अपने खनिजों के मूल्य का 95% से अधिक खो दिया है। कोई भी नुकसान प्रभावी रूप से एक छिपा हुआ टैक्स है जो कुछ निष्कर्षकों और उनसे जुड़े धनकुबेरों को और अमीर बनाता है। इस कारण असमानता तेजी से बढ़ती है। एक तरह से कहा जाए तो यह लूट का अर्थशास्त्र है।

इससे भी बुरी बात यह है कि सरकार द्वारा प्राप्त की जाने वाली मामूली धनराशि को “राजस्व” के रूप में माना जाता है और खुशी के साथ खर्च किया जाता है, जिससे न तो खनिजों और न ही आने वाली पीढ़ियों के लिए उनका मूल्य विरासत में मिलता है। यह सिर्फ टिकाऊ नहीं है।

नुकसान, हिसाब-किताब की खामियां

दुनियाभर से खनन में बड़े नुकसान के अनुभवजन्य साक्ष्य बढ़ रहे हैं। आईएमएफ से इस बात के भी सबूत बढ़ रहे हैं कि ब्रिटेन और नॉर्वे जैसे संसाधन संपन्न देशों सहित कई सरकारें सार्वजनिक क्षेत्र की कुल संपत्ति में गिरावट का सामना कर रही हैं। यानी, उनकी सरकारें गरीब होती जा रही हैं। दोनों अनिश्चित खनन का संकेत देते हैं।

खनिज मूल्य में होने वाली हानि खनन के साथ अन्य कई समस्याओं को जन्म देती है। वास्तव में, गोवा के लोगों और भावी पीढ़ियों ने 100 रुपये मूल्य वाली खनिज संपत्तियां महज 5 रुपये में बेची हैं जो कि 95 रुपये का नुकसान है। वहीं, स्वाभाविक तौर पर निष्कर्षक जल्द से जल्द निष्कर्षण कर के आगे बढ़ने के इच्छुक होते हैं। पेड़, बाघ और आदिवासियों को विकास-विरोधी या राष्ट्र-विरोधी करार दिया जाता है।

यदि खनन की अनुमति के लिए 5 रुपये प्राप्त होता है, तो खनन को दोगुना करने पर 10 रुपये प्राप्त होगा। राजनेता और मतदाता अधिक से अधिक खनन को बेहतर समझते हैं, इससे अधिक सरकारी राजस्व प्राप्त होगा जिसे वे सभी अच्छा मानते हैं। चूंकि निष्कर्षण को विरासत में मिली संपत्ति की बिक्री के रूप में मान्यता प्राप्त नहीं है, ऐसे में 95 रुपये का असली नुकसान छिपा हुआ रह जाता है। वहीं इसी तरह अत्यधिक खनन जारी रहा तो वर्तमान की खराब स्थिति को और बदतर बनने में वक्त नहीं लगेगा। 

यह समझना महत्वपूर्ण है कि जब तक सरकारी लेखांकन मानक सलाहकार बोर्ड सार्वजनिक क्षेत्र के हिसाब-किताब में और खनिज संपदा के लिए रिपोर्टिंग के मानकों में इस खामी को ठीक नहीं करता है, तब तक राजनेता और मतदाता बढ़ते निष्कर्षण की वकालत करेंगे। ऐसा ही चलता रहा और इस तरह के वांछित लूट के खिलाफ कोई नैतिक या कानूनी सुरक्षा उपाय नहीं किए गए तो आगे चलकर सारा का सारा खनिज निकाल लिया जाएगा। यह आवश्यक है कि एक राष्ट्र के रूप में हम खनिजों को “साझा विरासत” के रूप में समझने के लिए अपने प्रतिमान को बदलें और इसे ”अप्रत्याशित लाभ वाले राजस्व” के स्त्रोत के रूप में न समझें।

 

इसका प्रबंधन कैसे करें

चूंकि खनिज लोगों और भविष्य की पीढ़ियों के लिए भरोसेमंद रूप से आयोजित एक साझा विरासत है, ऐसे में हमारा सबसे महत्वपूर्ण कर्तव्य इसकी चोरी, नुकसान, बर्बादी को रोककर और इसकी खपत को कम कर हमारे बच्चों की विरासत का मूल्य बनाए रखना है। खनिजों को अधूरा छोड़ना हमारा कर्तव्य पूरा करता है।

इसलिए, अगर हम अपनी खनिज संपदा को निकालते और बेचते हैं, तो इसका स्पष्ट उद्देश्य मूल्य में शून्य हानि को प्राप्त करना होना चाहिए। ट्रस्टी के रूप में राज्य को पूर्ण आर्थिक किराया हासिल करना होगा। कोई भी हानि हम सभी और हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए एक नुकसान है, जो कुछ लोगों को अमीर बनाती है और यह पूरी तरह अनुचित है। भारत की राष्ट्रीय खनिज नीति 2019 कहती है: “राज्य सरकारें यह सुनिश्चित करने का प्रयास करेंगी कि निकाले गए खनिजों का पूरा मूल्य राज्य को प्राप्त हो।”

नॉर्वे की तरह, एक फ्यूचर जेनरेशन फंड में संपूर्ण खनिज बिक्री आय बचाई जानी चाहिए। फ्यूचर जेनरेशन फंड को राष्ट्रीय पेंशन योजना ढांचे के माध्यम से निष्क्रिय रूप से निवेश किया जा सकता है।

एक वैश्विक न्यायिक मिसाल कायम करते हुए, 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने गोवा आयरन ओर परमानेंट फंड बनाने का आदेश दिया, जिसमें पहले से ही लगभग 500 करोड़ रुपये का एक कोष है। इस तरह के फंड की वास्तविक आय केवल नागरिकों के लाभांश के रूप में, सभी मालिकों के लिए समान रूप से वितरित की जा सकती है। भावी पीढ़ी को अपनी बारी में लाभांश से लाभ होगा।

 

निष्पक्ष खनन पर

भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए (a) यह टिकाऊ है- पूंजी बनाए रखी गई है, (b) बचत दर में वृद्धि होगी और घरेलू पूंजी को अधिक लंबी अवधि में उपलब्ध कराएगी, (b) यह संभावित रिटर्न में सुधार करते हुए जोखिम में विविधता लाता है- प्रतिफल की बाजार दर को बेहतर बनाना लगभग असंभव है, (d) लाभांश अपने प्रभाव में एक यूनिवर्सल बेसिक इनकम है, (e) असमानता कम होने से आर्थिक प्रदर्शन बेहतर होती है, और (f) बजट के रूप में अब खनन धन आसान नहीं है, सार्वजनिक निवेश और टैक्स प्रशासन अधिक प्रभावी और कुशल हो जाएगा। यह छह गुना आर्थिक वृद्धि है।

निष्पक्ष खनन के ये सिद्धांत पूरी तरह से संवैधानिक हैं, न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व को बढ़ावा देते हैं। वे नैतिक, निष्पक्ष, सही और टिकाऊ हैं। घाटे में कमी भ्रष्टाचार, क्रोनी कैपिटलिज्म और बढ़ती असमानता को सीमित करेगी। वे हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए अपने कर्तव्यों को पूरा करते हैं। आइए हम वह पीढ़ी बनें जो इतिहास के पाठ्यक्रम को बेहतर बनाता है, न कि वह जो ग्रह का उपभोग करता है।

 

 

(राहुल बसु गोवा फाउंडेशन में रिसर्च डायरेक्टर हैं और ‘द फ्यूचर वी नीड’ के सदस्य हैं, जो खनिजों के साथ शुरू होने वाली सभ्यता के लिए इंटरजेनरेशनल इक्विटी की नींव बनाने के लिए एक वैश्विक आंदोलन है।)

 

 

 

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