पानी का नायक पद्मश्री सिमोन उरांव

85 साल के झारखंड के सिमोन उरांव देश भर में पानी बचाने की मुहिम के सबसे बड़े जीवित नायकों में से एक हैं, जिन्हें भारत सरकार ने पद्मश्री से सम्मानित किया। बाबा सिमोन और सिमाने दा के संबोधन से इलाके में मशहूर सिमोन 1955 से सुखाड़ के खिलाफ और पानी को बचाने के लिए जंग लड़ रहे हैं। वह भी तब जब जल संचयन को लेकर इतना हाहाकार और शोर-शराबा नहीं था। उस समय उन्होंने अपने हौंसले और दृढ़ निश्चय से अकेले ही बेड़ो प्रखंड के आसपास के छह गांवों में तालाब खुदवाए।

जल संचयन की देशज़ तकनीक के सहारे सिमोन उरांव ने 27 साल की उम्र से बारिश के पानी और पहाड़ों के पानी को संजोए रखने के लिए देशज तरीक़े से छोटे-छोटे बाँधों का निर्माण किया। आसपास के गाँव वालों के साथ और सहयोग से उन्होंने सिंचाई और जल संचयन के लिए पहला बाँध गायघाट पर बनाया। इसके बाद जल संचयन की अगली कड़ी में उन्होंने गिरना बाँध बनाया। बेड़ो के ग्रामीणों के सहयोग से उन्होंने क़रीब 500 फीट लंबी नहर का निर्माण जंगल और पहाड़ को काट कर किया और सैकड़ों एकड़ बंजर जमीन जहाँ फ़सलें कभी नहीं उगती थी, अब वहां तीन फसल की खेती होने लगी है। इस उत्साह का ही असर है कि अब धीरे-धीरे पूरा इलाक़ा पानीदार होने के कारण बंजर जमीन को सोना बना रहा है। पानी को बचाने की देशज विधि से उन्होंने बेड़ो में लगभग पचास से ज्यादा गाँवों की किस्मत बदल दी है और अब इन गाँवों के ज्यादातर इलाकों में अनाज व सब्जियों की भरपूर खेती होती है। अब इन गाँवों में सालों भर पानी बना रहता है। सिमोन दा का गांव खकसी टोली और आसपास के दर्जनांे गाँव अब झारखंड में कृषि के प्रमुख केंद्र के रूप में विख्यात हो गए है, जहाँ प्रति वर्ष लगभग 15 से 20 हजार मीट्रिक टन हरी सब्जी का उत्पादन होने लगा है।

महज चौथी क्लास तक की पढ़ाई करने वाले सिमोन उरांव बीते कई दशक से सूखे के खिलाफ जंग लड़ रहे हैं। वह ख़त्म हो रहे जंगल पर उतने ही चिंतित है, इसलिए उन्होंने जल संचयन के लिए बड़े इलाके में वृक्षारोपण कर अनूठी मिसाल पेश की। सिमोन दा बेड़ो क्षेत्र के आसपास के ग्रामीणों को एक साथ मिलकर काम करने के लिए लगातार प्रेरित करते रहते हैं।

सिमोन दा प्रकृति के बीच का एक आम आदमी है, जिसने प्रकृति के संसाधनों को प्रकृति के नियम के अनुसार ही देखने की कोशिश की है ताकि जल, जंगल और जमीन की हिफाजत के साथ लोगों के जीवन पर भी कोई ख़तरा न बने। वो पुराने और देशज़ ज्ञान के पैरोकार हैं, इसलिए पानी और खेती को सहजने में उन्होंने एक समान नियम का पालन करते हुए हज़ारों लोगों के लिए पानी सहेजने की दिशा दिखाई है। उन्होंने सिंचाई के प्राकृतिक नियम का लंबे समय से पालन किया है, जो मौजूदा रासायनिक खाद आधारित ज़हरीली खेती से अलग होते हुए भी लोगों का पेट भरने में सफल है। प्रकृति पर आधारित यह खेती भविष्य का विकल्प है, जिसका जीवंत उदाहरण वह पेश कर रहे है। ज़रूरी है कि सरकार सिमोन उराँव जैसे लोगों के प्रयोगों को बड़े स्तर पर बढ़ाने का काम करे, ताकि भावी पीढ़ी के भोजन और पानी के संकट को समय रहते दूर किया जाए। 

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