बिन पानी सब सून : विकराल होता जल संकट

एक अनुमान के अनुसार देश भर में क़रीब 190 थर्मल पॉवर प्लांट स्टेशन हैं, जिससे क़रीब 221 गिगावट बिजली की बनाई जा रही है। अनुमान यह भी है कि कोयले से 1000 मेगावाट बिजली बनाने में जितना पानी का इस्तेमाल होता है, उसमें देश में क़रीब 7 हजार हेक्टेयर कृषि भूमि को सिंचित किया जा सकता है। इतने ही पानी में रोज़ाना हम आठ लाख लोगों तक पीने का पानी भी उपलब्ध करा सकते है।

पूरा देश बीते दो-ढाई दशक से पानी के गंभीर संकट से गुजर रहा है। जल संकट की गम्भीर समस्या के पीछे एक बड़ी उपभोक्तावादी सोच की अर्थव्यवस्था है, जिसने आज के समय में पानी का विकराल संकट पैदा कर दिया है और जिसकी वजह से प्रकृति के साथ जीने वाले सभी तरह के जीवन को भी ख़तरे में डाल दिया है। 

सरकारों ने शहरीकरण और विकास नीतियों को आगे बढ़ाने के लिए वनों की अवैध कटाई की। जंगल के जंगल विकास के नाम पर उजाड़ दिए गए, ताकि कोई शहर और चौड़ी सड़कों का निर्माण कराया जा सकता था। विकास का ये आलम है कि देश के ज़्यादातर ग्रामीण इलाक़ों में पुराने तालाबों पर अतिक्रमण करके कई तरह के निर्माण कार्य कर दिए गए, जिसकी वजह से ग्रामीण इलाक़ों के ‘वाटर टेबल’ (Water Table) में भारी गिरावट देखी गई है। प्रदूषण फैलने वाली कम्पनियों के गाद की वजह से नदियों का बहाव रुक गया है और पानी भंडारण क्षमता में कमी आई है। तमाम तरह की औद्योगिक ईकाइयां और शहरों के प्रदूषित पानी ने बीते पचीस-तीस सालों के दौरान नदियों के प्रदूषण और भूजल का बेतहाशा दोहन किया है, जिसकी वजह से आज पानी लोगों के लिए सबसे बड़ी समस्या बन कर आई है।

जल संकट ने अब खेती के लिए संकट पैदा कर दिया है, पानी की कमी की वजह से खेतों की सिंचाई के लिए जो आवश्यकता होती थी, उसमें कमी आ रही है। देश के कई राज्यों में सुखाड की स्थिति लगातार बनी हुई है और किसान अन्न उगाने में असमर्थ और असहाय होता जा रहा है। जल संकट ने देश के ज़्यादातर इलाक़ों में पीने के पानी की समस्या को भी बढ़ा दिया है, पर इससे बेखबर लोग बिना किसी पुनर्भरण (Water Recharching) नीति के भूजल का बेतहाशा दोहन कर रहे हैं। बीते कई साल से पहले जैसी बारिश भी नहीं हो रही है, जिसकी वजह से हमारे शहरों और ग्रामीण इलाक़ों में भूजल का स्तर लगातार गिरता जा रहा है। यही हाल देश के जंगलों का भी है। बारिश में आई कमी ने जंगलों को सूखा बना दिया है। जंगलों से नमी ग़ायब हो गई है, इसलिए आए दिन हमारे जंगल आग की चपेट में आकर ख़त्म होते जा रहे हैं। 

आज जो पीढ़ी पानी को लेकर हाहाकर मचाए हुए है, उनसे आने वाली पीढ़ी ज़रूर प्रश्न पूछेगी कि  आखिर पानी गया कहां? पानी से लबालब धरती आख़िर सूख क्यों गई? वह पूछेगी कहीं ऐसा तो नही कि धरती ही सब पानी पी गई या आसमान के ताप ने सब कुछ निगल लिया? ऐसे हालात भविष्य में मानवीय आबादी के बचे होने पर ही सवाल खड़े कर रहे हैं।  

इस देश में पानी का सबसे ज़्यादा इस्तेमाल खेती और कोयले से बिजली बनाने के लिए किया जाता रहा है। हरित क्रांति के बाद से हमारे खेतों में पानी के संकट देखे गए हैं। हरित क्रांति ने देशज़ खेती के नियम और क़ायदे-क़ानून बदले और खेती में पानी का ज्यादा दोहन बढ़ा दिया है। जिसकी पहले के परंपरागत सिंचाई की विधि ही बदल गई और अब उनकी जगह पर ज्यादा पानी वाली फसलें हो रही हैं। देश को बिजली की दूधिया रौशनी और विकास के रास्ते में लेकर जाने की सनक ने हज़ारों नहरों और सैकड़ों नदियों को ख़त्म कर दिया है।

“एक अनुमान के अनुसार देश भर में क़रीब 190 थर्मल पॉवर प्लांट स्टेशन हैं, जिससे क़रीब 221 गिगावट बिजली की बनाई जा रही है। अनुमान यह भी है कि कोयले से 1000 मेगावाट बिजली बनाने में जितना पानी का इस्तेमाल होता है, उसमें देश में क़रीब 7 हजार हेक्टेयर कृषि भूमि को सिंचित किया जा सकता है। इतने ही पानी में रोज़ाना हम आठ लाख लोगों तक पीने का पानी भी उपलब्ध करा सकते है।”

थर्मल पावर प्लांट की वजह से पानी की कमी से उपजे सूखे की क़ीमत चुकाने के लिए शायद हम और आप न रहे, पर वक़्त अपने हिसाब से आगे बढ़ जाएगा और आने वाली पीढ़ी पानी की क़ीमत चुकाएगी जिसके भविष्य के लिए हम ज़रा भी नहीं सोच रहे हैं। ज़रूरत है कि पृथ्वी पर मौजूद जैव विविधता को समझे। जल, जंगल और जमीन महत्वपूर्ण संसाधन हैं, इसे इसे बचाने का प्रयास सुव्यवस्थित ढंग से हो ताकि इसका बेतहाशा दोहन न हो। पानी से ही संसार में समस्त जीवन है। बिन पानी मनुष्य, जीव-जंतु, पक्षी, सूक्ष्म जीव के बचे रहने की कल्पना नहीं की जा सकती है।

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