हिमालय बचाने को बनानी होगी अलग नीति

तस्वीर The Global Environment Facility से साभार ली गयी है।
सन् 2014 में जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी की सरकार केन्द्र में बनी तो उन्होंने अपने घोषणा पत्र में हिमालय के विषय पर अलग यूनिवर्सिटी स्थापित करने की घोषणा की थी।
यद्यपि देश की सभी यूनिवर्सिटी में हिमालय के नाम पर कोई न कोई शोध कार्य अवश्य होते रहते है। इसके पहले से ही गोविन्द बल्लभ पंत हिमालय पर्यावरण एंव विकास संस्थान तो केवल हिमालय के विषय पर ही केन्द्रित होकर काम करता रहा है। यह संस्थान अपने में एक ऐसा स्रोत है जहाॅ पर भारत ही नही बल्कि दक्षिण एशिया के हिमालय की जलवायु, पर्यावरण और यहाॅ के निवासियों के बारे में पूरी जानकारी देता है।
यूपीए सरकार के हिमालय ईको मिशन कार्यक्रम के तहत जो जीवी पंत हिमालय पर्यावरण एंव विकास संस्थान ने हिमालय के विषय पर ऑक्डो सहित दस्तावेज सामने लाये थे, वही हिमालय विकास के नये माॅडल की तरफ ध्यान आकर्षित करता है। यदि हिमालय के विकास के बारे में केन्द्र की सरकार भविष्य में कुछ नया करना चाहती हैं तो हिमालय बचाओ आन्दोलन का घोषणा पत्र और महात्मा गाॅधी की शिष्या सरला बहन द्वारा लिखी गई पर्वतीय विकास की सही दिषा और हिमालय लोक नीति के दस्तावेज का भी अवलोकन करना चाहिये। नीति आयोग को एक टास्क फोर्स का गठन करना चाहिये जो इन दस्तावेजों के आधार पर हिमालय विकास की सही दिशा को निर्धारित कर सके।
हिमालय यूनिवर्सिटी के द्वारा भी केन्द्र सरकार यही करना चाहती थी कि हिमालय विकास की तरफ नयी सोच के लिये कदम आगे बढाया जा सके । इसके वावजूद भी हिमालय यूनिवर्सिटी इसलिये नहीं बनी होगी कि पहले से ही हिमालय की संवेदनशील आदि के बारे में कई शोध कार्य हो रखे है।
संसद में 11 जुलाई 2014 को वर्तमान कैबिनेट मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने हिमालय के विकास के नये माॅडल पर पर्याप्त सबूतों के साथ अलग मंत्रालय बनाने की जोरदार पहल की थी । इसके बाद संसद में हुयी इस बहस के नतीजे किताब के पन्नों की षोभा बढाने तक ही सीमित हो गयी हैं। इस विषय पर पक्ष-विपक्ष को संसद में पुन; विचार करना चाहिये।

सितम्बर 2010 से उत्तराखण्ड में हिमालय दिवस इसलिये मनाने का निर्णय हुआ था कि केन्द्र व हिमालय राज्यों की सरकार अलग से हिमालय की भौगोलिक, सामाजिक, सांस्कृतिक स्थिति को ध्यान में रखकर कोई ऐसा विकास का माॅडल तैयार करेगी, जिससे हिमालय का विनाष रूक सकें। लोगों की आजीविका के साधनों का संरक्षण हो, जिसके विषय पर पिछले दस वर्षो में केन्द्र सरकार को सामाजिक कार्यकर्ताओं, पर्यावरणविदों और आम जनता ने कई सुझाव पत्र भेजे है। जिसमें कई लोगों के हस्ताक्षर है, इस पर भी सरकार का ध्यान जाना चाहिये था।
अब स्थिति यह है कि 9 सितम्बर हिमालय दिवस हो या साल के अन्य दिनों में जहाॅ-जहाॅ हिमालय के नाम पर मीटिग हो रही हैं ,वे सिर्फ चिन्ता तक सिमट रही है। इन बैठकों में मुख्यमंत्री, मंत्री, सचिव स्तर के प्रतिनिधि भी भाग लेते है। इसके वावजूद भी स्थिति यह है कि आधुनिक विकास में निर्माण कार्यो के जो मानक मैदानों के लिये बनाये गये है, उसमें थोडा भी बदलाव नहीं किया जा रहा है। जिसका परिणाम यह है कि ग्लेष्यरों के नजदीक बेहिचक भारी निर्माण कार्य हो रहे है। लाखों दुर्लभ वन प्रजातियाॅ, जैव विविधता, आदि नष्ट हो रहे है। नदियों के सिरहाने से लेकर दोनो किनारो पर निर्माण कार्यो का मलवा पडा हुआ है। बाढ और भूस्खलन कम होने का नाम नहीं ले रहा है। निर्माण कार्यो के ढाॅचे इतने कमजोर बने है कि एक ही बर्षात में उनकी बुनियाद हिल रही है।
काबिलेगौर है कि मीडिया और पर्यावरण एक्टिविष्ट हिमालय की इन गम्भीर समस्याओं की ओर लगातार ध्यानाकर्षित कर रहे है। अब इस बात को हिमालयी राज्यों के मुख्यमंत्री भी कहने लगे है। इसका अर्थ होता है कि सरकारें समस्या का समाधान ढॅूढकर भी नहीं कर पा रही है।
पिछले दिनों उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने एक वीडियो काॅन्फ्रेसिंग के दौरान केन्द्रिय मंत्री नरेन्द्र तोमर से कहा कि हिमालयी राज्यों के विकास का पृथक माॅडल बनाना चाहिये। इसी तरह पिछले 2-3 वर्षो से मसूरी में हिमालयी राज्यों के प्रतिनिधि चिंतन -मनन कर रहे है। वे भी हिमालय के लिये अलग विकास की नीति की माॅग कर रहे है। लेकिन इसमें चिन्ता की बात हैं कि जब मुख्यमंत्री और केन्द्रिय मंत्री हिमालय के लिये अलग मंत्रालय,हिमालय नीति आदि की बात करने लगे है तो इसे बनायेगा कौन ?

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