बिहार में बाढ़ के बाद सूखा

बिहार में किसी भी बुज़ुर्ग से बाढ़ के बारे में पूछिए तो वह 1954 की बाढ़ का ज़िक्र बड़ा रस लेकर बतायेगा. उससे पूछिए कि बाढ़ के बाद सूखा भी पडा था तो यह बात उसे याद नहीं आयेगी मगर यह सच है. यह बात हमारे अधिकांश इंजीनियरों को भी पता नहीं होगी. 1954 में हथिया का मौसम आने से पहले ही बारिश प्रायः समाप्त हो गयी थी और राज्य सूखे से तबाह हो गया था. उस साल सितम्बर मध्य के बाद पानी राज्य में प्रायः बरसा ही नहीं था.

अक्टूबर मध्य में मुंगेर में पिछले तीन सप्ताह से वर्षा नहीं हुई थी और तालाब, आहर सब सूख चुके थे. झाझा में किसानों को बीज की कीमत भी वापस मिलने की उम्मीद नहीं थी. तारापुर थाने के जमुआ गाँव में पानी के उपयोग को लेकर आपसी झगड़े में 6 लोग सितम्बर महीनें में मारे जा चुके थे. शाहाबाद जिले में धान की फसल जल रही थी और नहरी इलाकों में भी पानी की भारी कमी महसूस की जा रही थी. बक्सर सब-डिवीज़न में तो नहर का पानी पहुँच भी नहीं रहा था.

पटना जिले में मसौढ़ी थाने में किसान छोटी-छोटी नदियों के पानी से सिंचाई की व्यवस्था करने की मांग सरकार से कर रहे थे. यही हालत हिलसा, सिंगरियावां, एकंगरसराय, कराय और फतुहा के किसानों की भी थी. दरभंगा के मधुबनी सब-डिवीज़न में किसानों ने अपनी मेहनत का अच्छा मुआवजा मिलने कि उम्मीद कर रखी थी मगर हथिया ने उन्हें पूरी तरह से मायूस कर दिया था. भागलपुर के दक्षिणी भाग बांका, रजौन, धोंढ़हिया, मुफस्सिल और कटोरिया के अधिकाँश गाँव में तिनका भी उगने नहीं जा रहा था. चंपारण में त्रिबेनी नहर के उत्तरी भाग में वर्षा हुई ही नहीं.

गया जिले में अगहनी धान की फसल तो मारी ही गयी रबी बोने के लिए नमी भी नहीं बची थी. जिले के हिसुआ, डुमरिया, नबीनगर, कुटुम्बा, मदनपुर, गुरपा, बाराचट्टी, फतेहपुर और बेला में किसान भुखमरी के कगार पर पहुँच गए थे. पकरी बरावां, कौआकोल, रजौली, वारिसलीगंज, बोधगया, शेरघाटी, इमामगंज, टेकारी, बारुन, रफीगंज, घोसी, मखदूमपुर थानों की 80 प्रतिशत फसल हथिया के न बरसने से मारी जा चुकी थी.

अक्टूबर 1954, के चौथे सप्ताह में पटना से प्रकाशित सर्चलाइट अखबार अपने सम्पादकीय (Failure of Hathiya in Bihar – बिहार में हथिया का पानी न होना) में लिखता है, “बिहार मैं सूखे की चर्चा करने के लिए उसके औचित्य को सिद्ध करने की जरूरत नहीं है. हथिया के न बरसने की वजह से स्थिति चिंताजनक हो गयी है. सितम्बर महीनें में बिहार विधानसभा में दक्षिण बिहार में अवर्षण को लेकर दो दिन तक बहस हुई थी. लेकिन तब से अब तक परिस्थिति और भी बदतर हुई है. बिहार में यह चिंता का विषय इस लिए भी है क्योंकि यह समस्या गंगा के उत्तर तक पहुँच गयी है. अब यह पहले दर्जे की त्रासदी होगी कि अधिकारी उत्तर बिहार की बाढ़ को तो याद रखें मगर सुखाड़ के प्रति अपने दायित्व को भूल जाएँ.”

बिहार के विभिन्न कोनों से मिलने वाली खबरों का हवाला देता हुआ अखबार लिखता है, “हथिया के पानी के न बरसने से गया जिले पर दुहरा असर पडा है. एक तो वहाँ की अगहनी की फसल तबाह हो गयी और दूसरे रबी की फसल की संभावना भी घट गयी जो जरूर बेहतर रही होती. नमी की कमी गया में रबी की बुवाई में जरूर आड़े आएगी. गोह थाने में मजदूर भुखमरी के कगार पर पहुँच गए हैं. पचहत्तर प्रतिशत धान हथिया के न बरसने से भागलपुर में सूख गया और सीतामढ़ी सुब-डिवीज़न में ढाई लाख एकड़ पर लगी फसल मुरझा गयी.

“मधुबनी से बुरी खबर आ रही है कि वहाँ वर्षा और पानी के अभाव में बिचड़े सूख रहे हैं. इस साल मधुबनी में हथिया का पानी बरसा ही नहीं. फतुहा में 60 प्रतिशत धान बारिश न होने से सूख रहा है. इसी तरह की खबरें बिहार के अन्य हिस्सों से भी आ रही हैं.

“यह तो एकदम सच है कि मनुष्य के प्राकृतिक आपदाओं के विरुद्ध किये गए छोटे-मोटे काम इन विपत्तियों को रोकने में कोई ख़ास भूमिका नहीं निभा सकते मगर बिहार सरकार का यह दायित्व बनता है कि वह वास्तविक स्थिति का सही-सही मूल्यांकन करे और वह सब कुछ करे जिसकी उससे अपेक्षा की जाती है. इस वक़्त जो सबसे जरूरी काम दिखाई पड़ता है वह यह है कि कि जहां कहीं भी संभव हो सके वहाँ फसल को बचाया जाए. यह काम सिंचाई के आसान और तुरंत कारगर होने वाले माध्यम से किया जा सकता है. कुएं वहाँ खोदे जाएँ जहा सिंचाई के कोई दूसरे साधन उपलब्ध न हों, अन्यथा मौजूदा जो भी साधन उपलब्ध हों उनका पूरा-पूरा उपयोग किया जाय. छोटी-छोटी नहरों का खोदना, पइन का निर्माण और हैण्डपम्प का वितरण, यह तीन ऐसी चीज़ें हैं, जिन्हें तुरंत शुरू करना चाहिए.

“बिहार सरकार को चाहिए कि वह सर्वाधिक सूखाग्रस्त इलाकों में तुरंत राहत कार्य खोले ताकि लोगों को काम दिया जा सके. यह बात हमें एक बार फिर जोर देकर कहनी पड़ रही है कि बिहार में जो सूखे की परिस्थिति पैदा हो गयी है उसकी मांग है कि तुरंत कार्रवाई की जाय और आने वाले महीनों की योजना अभी से बना ली जाय. इस बात को टाला तभी जा सकता है जब हम यह तय कर लें कि अकाल को निमंत्रण देना ही है, जैसा कि राज्य के बहुत से हिस्सों में हो भी चुका है.”

फिर भी आम मान्यता है कि 1954 की बाढ़ सिर्फ बाढ़ थी, सूखे की उसमें कोई जगह नहीं थी. ऐसा बिहार के साथ अक्सर हुआ है और इस साल भी हो रहा है.

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