पर्यावरण शुद्ध करने के लिए लॉकडाउन से ज्यादा बुद्धि पर लगा ताला खोलना जरूरी

कोरोना वायरस के संक्रमण के शुरूआती दौर से लेकर अबतक दुनिया बहुत बदल गई है. देश में कोरोना वायरस के कहर से बचने के लिए लॉकडाउन को कई चरणों में लागू किया गया है. कल, कारखाने, वाहन, ट्रेन, जहाज, हवाई जहाज, मंदिर और मस्जिद सबकुछ बंद कर दिए गए. इसके चलते लाखों लोग रातोंरात बेरोजगार हो गए. इस दौरान सबसे अधिक आवश्यकता अच्छे स्वास्थ्य व्यवस्था की महसूस की गई लेकिन उसकी कलई खुलकर सामने आ गई.

लॉकडाउन से पहले प्रकृति को मनुष्य सभ्यता के विकास के लिए अपने प्राणों की जो सर्वाधिक बलि देनी पड़ी थी, उसे अपने घावों और जख्मों को भरना था. लॉकडाउन का पहला और दूसरा चरण पूरा होते—होते यह खबर आने लगी कि गंगा का पानी 50 फीसदी से ज्यादा साफ हो चुका है. कई तरह की मछलियां जो गंगा व अन्य नदियों से चली गई थीं, लौट आई हैं. वायु प्रदूषण और ध्वनि प्रदूषण के स्तर में भी गुणात्मक रूप से सुधार दर्ज किया गया.

नदियां हुईं साफ, बढ़ी ऑक्सीजन की मात्रा

लॉकडाउन में नदियों के जल के प्रदूषणा में भारी कमी आई है. केंद्र और राज्य सरकारें जो वर्षों से गंगा स्वच्छता के नाम पर हजारों करोड़ बहाकर भी इसे साफ नहीं कर पाई. सत्ता के विकास वाले पहियों पर जरा सी रोक लगी नहीं कि गंगा ने अपनी सफाई के काम की गति बढ़ा ली. इस नदी में बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड (बीओडी) में भारी गिरावट आई है और ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ती चली गई. यमुना नदी के प्रदूषण में भी 33 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है.

जाहिर सी बात है कि यह सब लॉकडाउन के बीच कल, कारखानों और सीवरेज का कचरा नदियों में आना कम हुआ है और इसके चलते नदियों के जल में प्रदूषण कम होता चला गया. यह सुधार भारत समेत दुनिया के कई नदियों में देखा गया. मीडिया की रिपोर्टों के अनुसार गंगा में छह तरह की मछलियां जो लुप्त हो गई थीं, लौट आईं.

हवा हुई साफ तो लोगों के स्वास्थ्य में आई सुधार

वायु प्रदूषण के कारण हर साल पूरी दुनिया में करीब एक करोड़ लोगों की मौत हो जाती है. वायु प्रदूषण के चलते हर साल 7 प्रतिशत बच्चों की भी मौत हो जाती है. निर्माण कार्यों और कल—कारखानों, वाहनों और घरों में भोजन बनाने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले ईंधन और धुओं से वायु प्रदूषित होता है.

वर्ल्ड एयर क्वालिटी रिपोर्ट-2019 के अनुसार वर्ष 2018 में दुनिया के 30 सर्वाधिक प्रदूषित शहरों में भारत के 22 शहर शामिल थे. वर्ष 2019 की रिपोर्ट में भी शीर्ष-10 में से 6 और शीर्ष-30 में कुल 21 शहर भारत के ही शामिल थे. लॉकडाउन के बाद जरूर हालात काफी तेजी से बदले हैं.

अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा की रिपोर्ट के अनुसार लॉकडाउन के दौरान उत्तर भारत में वायु प्रदूषण दो दशकों में सबसे निचले स्तर पर है. लॉकडाउन के दौरान देश में दिल के मरीजों की संख्या में 75 प्रतिशत तक कमी आ गई. हालांकि लॉकडाउन में मरीजों की संख्या में कमी आने की वजह रोगियों का हॉस्पिटल नहीं पहुंच पाना भी हो.

वायु प्रदूषण का एक प्रमुख कारण वाहनों से निकलने वाला धुआं है. वाहन से निकलने वाले धुआं में कार्बन मोनोऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड, हाइड्रोकार्बन तथा सस्पेंडेड पर्टिकुलेट मैटर जैसे खतरनाक तत्व एवं गैसें होती हैं जो स्वास्थ्य के लिए बहुत ही हानिकारक हैं. कार्बन मोनोऑक्साइड जब सांस के माध्यम से शरीर के अंदर पहुंचता है तो वहां हीमोग्लोबिन के साथ मिलकर कार्बोक्सीहीमोग्लोबिन नामक तत्व बनाता है.

इस तत्व के कारण शरीर में ऑक्सीजन का संचार सुचारू रूप से नहीं हो पाता है। नाइट्रोजन मोनोऑक्साइड और नाइट्रोजन डाइऑक्साइड भी कम खतरनाक नहीं हैं. नाइट्रोजन मोनोऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड की तरह ही हीमोग्लोबिन के साथ मिलकर शरीर में ऑक्सीजन की मात्रा घटाता है. वाहनों से निकलने वाला हाडड्रोकार्बन पौधों के लिए हानिकारक है. सस्पेंडेड पर्टिकुलेट मैटर छोटे-छोटे कण हमारे फेफड़ों को नुकसान पहुंचाते हैं. श्श्वांस संबंधी समस्या उत्पन्न करते हैं. वाहनों से फैलने वाले प्रदूषण से निपटने के लिए जरूरी है कि पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम को बेहतर बनाया जाए.

थमे वाहनों के पहिए तो ध्वनि प्रदूषण भी हुआ कम

लॉकडाउन के चलते ध्वनि प्रदूषण में भी भारी कमी आई है. केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) की अध्ययन रिपोर्ट के मुताबिक ध्वनि प्रदूषण में 5 से 10 डेसीबल (डीबी) की कमी आई है. हालांकि, रिहायशी इलाकों में इसका ज्यादा असर देखने को नहीं मिला, लेकिन जिन इलाकों में ट्रैफिक की समस्या ज्यादा रहती है, वहां लॉकडाउन के चलते ध्वनि प्रदूषण में भारी असर देखने को मिला. दिल्ली और मुंबई के भीड़भाड़ वाले इलाकों में जहां दिन के समय ध्वनि प्रदूषण का सामान्य स्तर 55 और रात में 45 डीबी होता था, वहां इसके लेवल में कमी आई है.

अब सवाल यह है कि क्या कल, कारखानों और दुनिया जगत के व्यवहारों को बंद करके हम पर्यावरण में सुधार कर सकते हैं? इस सवाल का जवाब ढूंढ़ पाना आसान नहीं है, क्योंकि पूरी दुनिया के संसाधनों पर कब्जा कर बैठे 10—20 फीसदी लोग बहुत ताकतवर हैं. वे दुनिया के अलग—अलग मुल्कों की नीतियां अपने खजाने के विस्तार के लिहाज से बनवाते हैं. भारत जैसे देशों में पर्यावरण को लेकर सरकारें बहुत ढीलाढाला रवैया अपनाती हैं.

सरकारें विकास के नाम पर एक—एक प्रोजक्ट के लिए हजारों की संख्या में पेड़ कटवा डालती हैं. पर्यावरण के साथ इस खिलवाड़ को लेकर आम लोग जब सड़कों पर सरकार का​ विरोध करने उतरती हैं तो उनकी बात सुनने की बजाय उनपर लाठियां बरसाई जाती हैं. उन्हें जेल में डाल दिया जाता है. केंद्र और राज्य की सरकारों ने कभी गंगा, यमुना सहित किसी भी नदी में औद्योगि कचरों का निपटान कैसे हो,कोई पॉलिसी नहीं बनाई. अगर बनाई तो उसे ढंग से कभी लागू नहीं किया. अब इन हालातों में पर्यावरण प्रदूषण को कैसे कम किया जा सकता है? लॉकडाउन पर्यावरण के प्रदूषण को कम करने का एक अल्पकालिक सॉल्यूशन मालूम पड़ सकता है, यह दीर्घकालिक समाधान नहीं हो सकता है.

करोड़ों लोगों को बेरोजगार करके और लोगों की रोजीरोटी खत्म करके पर्यावरण के प्रदूषण को कम करने की बात बेमानी होगी. अब ऐसे में नी​ति—नियंताओं को पर्यावरण से जुड़े शोधकर्ताओं, पर्यावरण वैज्ञानिकों के साथ—साथ जनता के हित में सोचने—समझने वाले अर्थशास्त्रियों के साथ विचार—विमर्श कर पर्यावरण संरक्षण के साथ साथ मनुष्य के हित सध सके, की नीति बनाने पर जोर देना होगा.

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