कोरोनावायरस का कहर और स्वास्थ्य सेवाओं का निजीकरण

तस्वीर मैप्सऑफ़इंडिया से साभार ली गयी है।
कोरोनावायरस भूमंडलीकरण की कोख से उपजा वायरस है, यह समझ तो अब बन ही गई होगी। हमसब यह भी जानते हैं कि यह चीन के वोहान( वुहान ) शहर में पैदा हुई और हवाई जहाज की रफ्तार से पूरी में छा गई। और हमसब यह भी जानते हैं कि इस वायरसीय महामारी ने सबसे ज्यादा कहर अमेरिका पर बरपाया। अभी भी अमेरिका इस की चपेट और लपेट में ही है।
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप जब भारत आये थे उसके पहले ही दुनिया के कुछ देशों में कोरोनावायरस ने आतंक मचाना शुरू कर दिया था। यह फरवरी का अंतिम सप्ताह था। क्या राष्ट्रपति ट्रंप को यह आभास नहीं था कि बहुत जल्द यह वायरस अमेरिका को भी अपनी लपेट में ले लेगा? अगर नहीं था तो इससे बड़ी अदूरदर्शिता और क्या हो सकती है? और अगर था तो उन्होंने भारत की यात्रा क्यों नहीं रद्द कर दी? इसके पीछे की राजनीति क्या थी? इसे समझने की जरूरत है।
अब जरा चीन पर बात करें।यह कौन नहीं जानता कि चीन एक ऐसा देश है जहां लोकतंत्र नहीं है।वह एक दलीय शासन से चलने वाला देश है । वहां की न तो मीडिया स्वतंत्र है और न वहां के नागरिक।ऐसी स्थिति में चीन पर भरोसा करना अपने पांव पर कुल्हाड़ी मारने जैसा है कि नहीं? फिर अमेरिका ने उस पर क्यों भरोसा किया?
चीन लाख सफाई दे , हमें यह मान कर चलना चाहिए कि वह कोरोनावायरस से संबंधित पूरा सच दुनिया को नहीं बतला सकता। वह किसी को भी यह जानकारी नहीं देगा कि उसके देश में इस महामारी से कुल कितने लोग संक्रमित हुए और कितने मौत की नींद सो गये। लेकिन एक बात तो माननी पड़ेगी कि चीन ने वोहान शहर में फैली इस महामारी को जिस योजनाबद्ध ढंग से नियंत्रित किया वह किसी तानाशाही वाले देश में ही संभव है। लोकतांत्रिक देश में ऐसा संभव नहीं। और पूंजीवादी लोकतांत्रिक देश में तो और भी नहीं
लेकिन हमने और पूरी दुनिया ने कोरोनावायरस को काबू में रखने के लिए जितने फौरी कदम उठाए सभी के सभी चीन के अनुभवों से अभिप्रेरित थे। क्या यह मान लिया जाए कि वायरस से मुकाबला का एक ही रास्ता है ? क्या लोकतांत्रिक देश और तानाशाही देश के तरीके एक ही होंगे?
मेरा मानना है कि नहीं , ऐसा नहीं हो सकता । ऐसा नहीं होना चाहिए। लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबी से हमसब परिचित हैं।सजग लोग और उनकी दृढ़ इच्छाशक्ति ही लोकतंत्र की बुनियाद होती है। लोकतांत्रिक देश की कल्याणकारी व्यवस्था उसकी ताकत। लेकिन पिछले ढाई दशकों में लोकतांत्रिक देशों में कल्याणकारी व्यवस्था को तिलांजलि देते हुए भूमंडलीकरण के नोर्म्स के कारण जिस प्रकार स्वास्थ्य सेवाओं को धत्ता बताया गया यह बात किसी से छिपी हुई नहीं है। ऐसा अमेरिका में भी हुआ और अपने देश में भी। स्वस्थ्य सेवाओं का जिस तेजी से निजीकरण हुआ उसका खामियाजा हम सब भुगत रहे हैं।
क्या कोरोनावायरस के कहर से हमने कुछ सीखा? अगर हां , तो स्वास्थ्य सेवाओं का नागरीकरण हम करेंगे? सार्वजनिक स्वास्थ्य अभिक्रम को आगे बढ़ायेंगे या भूमंडलीकरण के नक्शे कदम चलते रहेंगे?

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