नदियों को उनका रास्ता दीजिए, बांध निदान नहीं है!

कमला नदी का तटबंध जयनगर से झंझारपुर तक 1950 के दशक में पूरा कर लिया गया था और इसे झंझारपुर से दर्जिया तक पहुंचाने का काम में पूरा किया गया था, जिसके बाद पहली बाढ़ में ही यह तटबंध रामघाट में 1963 में टूटा था।

इस दरार से निकले पानी की चपेट में खरवार, गंगापुर, गुणाकरपुर और बेल्ही जैसे बहुत से गाँव आ गए थे। 1964 में यह तटबंध दैया खरवार के समेत चार जगह टूटा जिससे झंझारपुर, मनिगाछी और मधेपुर प्रखंडों के बहुत से गाँव पानी से घिर गए थे। इस तरह से मानव निर्मित बाढ़ झेलने का इन गाँवों का नया अनुभव था। इसी साल जयनगर के पास लक्ष्मीपुर गाँव का कुछ हिस्सा कट कर नदी में समा गया था।

इसके बाद आया 1965, जब आज इस साल की ही तरह जुलाई महीने में भारी तबाही हुई थी। इस साल नेपाल की तराई में जुलाई के पहले सप्ताह में जम कर बारिश हुई थी। झंझारपुर के पास रेलवे लाइन का अधूरा पुल अपनी में ऊंची की हुई अप्प्रोच रोड के साथ तटबंधों के बीच इस पानी के सामने खडा था।

8 जुलाई को सिर्फ 10 घंटे में नदी का जलस्तर 2 मीटर चढ़ गया और 1964 में देखे गए उच्चतम जलस्तर को पार कर गया तथा रेलवे लाइन की अप्प्रोच रोड को तोड़ता हुआ नीचे की ओर बढ़ा, जहां इसने नदी के दोनों ओर तटबंधों को तहस-नहस कर दिया। इस बार कुल मिला कर इस कमला-बलान नदी के तटबंध 21 जगह टूटे थे। रेल और सड़क मार्ग के बंद हो जाने के कारण सूचना मिल जाने के बावजूद दरभंगा के कलक्टर जे. सी. जेटली झंझारपुर पहुँच नहीं पाए और उन्हें पिपरा में रुक जाना पड़ा।

यह बाढ़ कमला के तटबंधों समेत अपने साथ पूरी रेल और सड़क संचार व्यवस्था को ले गई। राहत कार्यों के लिए रखा अनाज गोदामों में ही सड़ गया और जो कुछ राहत के नाम पर बंटा, वह जानवरों के खाने लायक भी नहीं था।

बड़ी मात्रा में फसलों और घरों का नुकसान हुआ। “इस महीने की 7-8 तारीख को मिथिला में लगन की अंतिम तिथि थी लेकिन बाढ़ की वजह से नव-विवाहित वर-वधु रेलवे स्टेशन पर खड़े रह गए और अपने गंतव्य तक नहीं पहुँच सके. वहाँ पर एक अजीब संकट उत्पन्न हो गया था और यातायात बंद हो गया था।” बहुत मुमकिन है कि बहुत सी बारातें बाढ़ में फँस गई हों और कई जोड़ों की शादी ही नहीं हुई हो।

50 साल के ऊपर हुआ, इस तरह की चेतावनी मिले हुए। इस बीच में कितनी ही सरकारें आई और गईं और शायद ही कोई पार्टी ऐसी हो, जिसने इस राज्य पर शासन न किया हुआ या उसका महत्वपूर्ण हिस्सा न रही हो। कितनी ही बार यह तटबंध टूटे होंगे। तटबंधों को ऊंचा करने के अलावा किसी को कुछ भी नहीं सूझता। उन्हें यह भी नहीं लगता कि बाढ़ नियंत्रण पर लगाईं गई पूँजी फायदे की जगह नुक्सान पहुंचा रही है। इसका मूल्यांकन ही कर लें ।

इंजीनियरों का क्या है, उन्हें तो जो हुक्म मिलता है, उसे पूरा कर देना है। वैसे भी उनकी सुविधा के लिए डॉ. के.एल. राव, तत्कालीन केन्द्रीय सिचाई मंत्री, 1966 में पहले ही लोकसभा में कह गए थे कि तटबंध बनेगा तो वह टूटेगा ही। अगर किसी ऐसी दुर्घटना की जांच करनी हो तो वह भी इंजीनियर खुद ही करेंगे। जिसके लिए इतना बड़ा तंत्र खडा किया गया है, वह सब कुछ गँवा कर सिर्फ तमाशा देखने का हकदार है।

(तस्वीर उपासना जी से साभार)

 

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