बाढ़ को मत कोसिए!

तस्वीर महेंद्र यादव द्वारा ली गयी है।

 

भले राज्य के 12 जिले डूबे हुए हैं, लाखों लोग बेघर हैं, दो दर्जन से अधिक लोग मर गए हैं, फिर भी मैं बाढ़ को आपदा कहने में हिचकिचाता हूं। क्योंकि हिमालय से हजारों साल से आ रही इस बाढ़ ने ही उत्तर बिहार की धरती की एक-एक इंच तैयार की है। इसलिए मैं कहता हूं, यह बाढ़ का मौसम है, तबाही का मौसम नहीं। उत्तर बिहार में बाढ़ हर साल आती है, जिस साल बाढ़ नहीं आती, सूखा पड़ता है।

कल सोपान जोशी जी ने बताया कि मानसून की बारिश हर साल हिमालय को भिगोती है और उस कच्चे पहाड़ को धोकर बाढ़ की शक्ल में आपके इलाके में उतरती है। यह अपने साथ सिर्फ पानी नहीं, उपजाऊ मिट्टी भी लाती है। इसी मिट्टी से उत्तर भारत के मैदान का निर्माण हुआ है, जिसकी नर्म और उपजाऊ धरती पर, जिसे गंगा और उसकी सहायक नदियों का मैदान कहते हैं, हम लोगों को रहने का सौभाग्य मिला है। अगर यह बाढ़ नहीं होती, यह इलाका समुद्र होता जो अरब सागर और बंगाल की खाड़ी को जोड़ रहा होता।

यह जानने के बाद आप कैसे इस बाढ़ को आपदा कह सकते हैं?

2013 में CSDS की एक फेलोशिप के सिलसिले में मैं खगड़िया के शहरबन्नी गांव में था। लोजपा नेता रामविलास पासवान का यह गांव बदला नगरपाडा तटबंध के बीच बसा है। इस गांव में हर साल बाढ़ आती थी, मगर जब मैं गया तो दो तीन साल से बाढ़ का आना कम हो गया था।

मुझे लगा कि इस बात से लोग खुश होंगे। मगर नहीं, वे उदास थे। कहने लगे, पहले जब बाढ़ आती थी तो पानी उतरने के बाद हम खेतों में मकई के बीज छींट देते थे। न सिंचाई की जरूरत, न खाद की। बम्पर पैदावार होती थी। अब दो तीन साल से हम लोगों को बोरिंग से सिंचाई करना पड़ता है, खाद देना पड़ता है।

गजानन मिश्र जी ने बताया कि इसी तरह उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में जब कोसी नदी पूर्णिया के इलाके में बहा करती थी, तब वह बंगाल सूबे का सबसे उपजाऊ इलाका माना जाता था। बुकानन ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि उस वक़्त पूर्णिया में 75 फीसदी धान की खेती ‘छीटा पद्धति’ से होती थी। तब एक बीघे में 9 क्विंटल धान होता था। अब पानी, खाद और मजबूरी खर्च करने के बाद कितना धान होता है मुझे नहीं मालूम।

अभी जब मैं यह सब लिख रहा हूं तो इस बात का भय भी है कि लोग कहेंगे, इस वक़्त जब लोग डूब भसिया रहे हैं तब मैं ज्ञान बघार रहा हूं। मगर मुझे लगता है कि इस बात को कहने सुनने का भी यही वक़्त है।

आज जो तबाही हम झेलते हैं उसके पीछे सिर्फ यह बाढ़ नहीं, इससे हमें सुरक्षा देने के लिए तैयार की गयी अवैज्ञानिक पद्धतियां भी जिम्मेदार हैं। पहले बाढ़ आती थी तो बड़ी नदियों का सरप्लस पानी, छोटी नदियों और चौरों में चला जाता था। बिहार में 8 बड़ी नदियों को 80 से अधिक सहायक नदियां हैं। पहले सारा पानी इन नदियों में बंटता था अब बड़ी नदियों के किनारे बने तटबंधों ने इस बंटवारे को रोक दिया है। बाढ़ रोकने के नाम पर बने इन तटबंधों ने छोटी नदियों से बड़ी नदियों का नाता खत्म कर दिया है। मेरे गांव के बगल में बहने वाली कोसी की उपधारा में अभी भी बहुत कम पानी होगा, हिरन धार तो सूख ही गई।

बड़ी नदियां तटबंध से घिर गई हैं तो ये न बाढ़ के पानी को पूरे इलाके में बांट पाती हैं, न अपने साथ लाई गई उपजाऊ मिट्टी को। ये उस पाईप की तरह हैं जिसमें छोटा सा छेद हुआ तो उसमें तेज गति से पानी निकलता है। अपने सामने के इलाके में तबाही मचा देता है।

जबकि पहले बाढ़ का पानी नदी के हर इलाके में मंथर गति से फैलता था। एक और बात यह हुई कि हिमालय पर पेड़ कटने लगे, पत्थर तोडे जाने लगे। जिससे ‘सिल्ट’ की मात्रा बढ़ गयी। पहाड़ पानी को रोकने में असमर्थ होने लगा। नदियों का बेसिन सिल्ट से भर गया अब उसमें पानी को रखने की क्षमता कम होने लगी।

बर्तन छोटा होने लगा। मौसमी बदलाव ऐसा आया कि बारिश के दिन घट गये और एक ही दिन में 300 मिमी तक बारिश होने लगी। यह इस बार की भी कहानी है। इन सब बातों ने मंथर बाढ़ को हिंसक बाढ़ में बदल दिया।

Picture@Mahendra Yadav

अब इन बातों को आंकडों की जुबानी भी सुन लिजिए। 1954 में राज्य की नदियों पर सिर्फ 160 किमी तटबंध थे, तब 25 लाख हेक्टेयर जमीन पर बाढ़ आती थी। अब 37 सौ किमी से अधिक तटबंध है, जो बाढ़ को रोकने के लिए बने हैं, मगर अब राज्य की 72 लाख हेक्टेयर जमीन बाढ़ प्रभावित हैं।

यह राज्य की कुल जमीन का तीन चौथाई है। उत्तर बिहार का हर जिला बाढ़ प्रभावित है। इसका आकलन कोई नहीं कर रहा। अभी 15 सौ किमी तटबंध और बनने हैं। 11 सौ तो सिर्फ महानंदा पर बनेंगे। आप सोच रहे होंगे, इनकी समीक्षा क्यों नहीं होती।

इसका जवाब भले आप और हम नहीं जानते हो, मगर इन नदियों के किनारे रहने वाला बच्चा-बच्चा जानता है। बाढ़ के मौसम में भले आम लोग कोसी कमला के किनारे रहने में परहेज करते हों, जल संसाधन विभाग के कर्मी रिश्वत देकर इन इलाकों में पोस्टिंग लेते हैं। क्योंकि हर साल राज्य के इन 3700 किमी लम्बे तटबंधों की सुरक्षा का बजट 600 करोड़ से अधिक है।

यह खर्च कैसे होता है यह सबको मालूम है। क्योंकि हर साल बाढ़ 600 करोड़ को बहा कर ले जाती है, इसलिए इनका ऑडिट भी नहीं हो पाता। ऐसे में भला विभाग के लोग क्यों तटबंधों की नीति की समीक्षा करने लगें। मगर हमको आपको तो सोचना चाहिए कि क्या सचमुच ये तटबंध हमारे लिए जरूरी हैं।

आप पूछेंगे, फिर क्या किया जाए? क्या सभी तटबंधों को तोड़ कर नदियों को आजाद कर दिया जाए? हर साल आने वाली बाढ़ का स्वागत किया जाए?

इसका जवाब हां भी है और अभी नहीं भी है। क्योंकि हमारे जैसे लोग जो तटबंधों को फालतू मानते हैं, वे भी तटबंधों को एक झटके में खत्म करने की बात पर सहम जाते हैं। क्योंकि पिछ्ले तीन दशकों में हमारे जीने का तरीका पूरी तरह बदल गया है।

बाढ़ को हम भले ही लाभदायक मानें, मगर फिलहाल तो इससे सुरक्षा और इसके आने पर राहत की जरूरत है ही, फिलहाल हम इसे झेलने के लिए तैयार नहीं हैं। मगर अगर हम लम्बे अन्तराल में बाढ़ और सुखाड़ दोनों से बचना चाहते हैं तो धीरे-धीरे हमें अपनी इन नदियों की आजादी की बात सोचनी चाहिए। और इनके साथ संगत बिठा कर जीने का तरीका विकसित करना चाहिए। अगर हो सके तो बड़ी नदियों को उनकी सहायक नदियों से फिर से जोड़ने की बात पर विचार करना चाहिए।

और कुछ नहीं तो कम से कम सोच तो बदलनी ही चाहिए। क्यों?

(तस्वीरें महेंद्र यादव के फेसबुक वॉल से ली गयी है।)

 

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