सूखा-लेकिन क्यों– कौन है इसका जिम्मेदार

जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण संकट-एक दिवसीय सेमीनार” आयोजक-पर्यावरण लोक मंच मेरठ

‘डाउन टू अर्थ’ प्रकाशन की एक किताब है -“ड्रॉट बट व्हाई”। केवल 126 पेज की यह किताब करोड़ों भारतवासियों की जिंदगी के बारे में कहानी बताती है। यूँ तो इस किताब में ज्यादातर आंकड़े और तथ्य 2014 से 2017 तक के हैं। पर यह किताब की सीमा बिलकुल नहीं बने हैं। बल्कि इस ढंग से किताब को लिखा गया है कि वह आजादी के बाद के गरीब भारत से शुरू होकर आज के अमीर होते भारत की कहानी बताती है।

पर्यावरण संकट के प्रभावों में सूखा और बाढ़ मुख्य हैं। सूखा आज देश भर में विकराल समस्या बनी हुई है। अब यह उतनी प्राकृतिक नहीं है जितनी यह मानव निर्मित है। यही इस रिपोर्ट का मूल है। आज की गई समाज में उत्पादन की गतिविधियाँ कल की सूखा को बुलाती हैं। सूखा बाकायदा न्यौते पर आता  है। 1997 के बाद सूखा प्रभावित क्षेत्रों में 57 फीसदी की वृद्धि हुई है। 

समस्या
आज ग्रामीण और शहरी जीवन में सूखा से आने वाली समस्याओं से कौन परिचित नहीं  है? सूखा से निपटने के लिए सरकारी कदम भी उठाये जा रहे हैं, पर वह ऊँट के मुँह में जीरे के समान हैं। गाँव में रोज़गार के साधन कम हो रहे हैं। शहरों की आबादी बढ़ रही है। अन्य समस्याओं के साथ पानी की विकराल समस्या भी हर किसी को अपने चपेट में ले रही है। आज स्थिति यह हो गयी है कि विकास की दौड़ में सबसे आगे मेट्रो शहरों के पास अपने उपयोग के लिए पर्याप्त पानी नहीं है।

Image courtesy: unhcr.org

दिल्ली के लिए पानी 300 किलोमीटर दूर हिमालय की घाटी में बने टिहरी डैम से आता है। हैदराबाद के लिए 105 किलोमीटर दूर कृष्णा नदी पर बने नागार्जुनसागर डैम से पानी आता है तो बैंगलौर में पानी की आपूर्ति 100 किलोमीटर दूर कावेरी नदी से की जाती है। उदयपुर अपनी झीलों के सहारे पानी की आपूर्ति करता है। यह झील अब सूखने के कगार पर हैं। शहरी जीवन भयंकर सूखा की गिरफ्त में है। 

ग्रामीण जीवन को सूखा और ज्यादा प्रभावित करता है। क्योंकि खेती से लेकर पशु-पालन तक सब पानी पर निर्भर है। सूखा पड़ने से पूरी अर्थव्यवस्था चरमरा जाती है। गाँव से शहरी इलाकों की ओर पलायन शुरू हो जाता है। हरियाणा के मेवात जिले की एक घटना है। 2015 की गर्मियों में किसानों ने धान की पौध लगाई। पहली बारिश में देरी हो गयी।

किसानों ने किसी तरह डीज़ल से ट्यूबवेल चला कर सिंचाई की। इसके बाद पौध तैयार थी। पर अचानक एक रात भयंकर तूफ़ान के साथ पाँच घण्टे झमाझम बारिश हुई। करीब 250 मिमी बारिश हुई। खेत पानी से डूब गए। इस क्षेत्र में सालभर में करीब 500 से 600 मिमी बारिश होती है,पर एक ही दिन में अचानक इतनी बारिश ने सब बर्बाद कर दिया। ऐसी स्थिति में किसानों की आँखों में आँसू के सिवा और क्या होगा? दूसरी घटना जम्मू की है। ठण्ड कम होने की वजह से जम्मू में लीची पर बे मौसम फूल आ गया। जैसे ही ठण्ड बढ़ना शुरू हुई फूल गिर गए। पूरी फसल मारी गयी। किसान मुँह देखते रह गए।

उधर मध्यप्रदेश में छोटे बच्चे स्कूल जाने की जगह अपनी माँ के साथ दिनभर पानी की खोज में भटकते रहते हैं। 
शहरों में उद्योग और फैक्ट्री साफ़ पानी को लेते हैं और बदले में लौटाते हैं – कचरा, गंदे नाले और प्रदूषित पानी। गाँव में किसान कुएँ को गहरा और गहरा करते जाते हैं। हर कोई पानी की अंतिम बूँद को निचोड़ लेना चाहता है। आज सूखा गरीब भारत के सर पर कोई प्राकृतिक आपदा नहीं बल्कि अमीर होते भारत की नीतियों की देन है। इससे निपटने के लिए सूखा क़ानून को बदलने की जरूरत है।

पानी की हर बूँद को बचाकर फिर से भूजल को पुनर्भरण करने की जरूरत है। इसके लिए हमें लाखों नए जलाशय बनाने होंगे। यह स्थानीय लोगों से सलाह मशविरा करके इस तरह बनाये जाएँ कि इनमें इकट्ठा पानी को लोग अपने रोजमर्रा के कामों में उपयोग कर सकें। रोजगार पैदा करने के लिए कहीं भी गड्ढा खुदवाने से काम नहीं चलेगा। ऑस्ट्रेलिआ और कैलफोर्निया में भी सूखा आया पर वहां की सरकारों ने गैर जरूरी पानी के खर्चे पर तुरन्त रोक लगा दी। भारत में भी यही करना होगा। इन प्रयासों से हम रोज-ब-रोज उद्योग, खेती, और घरेलू स्तर पर पानी बचा सकेंगे। साल-दर-साल हमारी बचत बढ़ती चलेगी। इस तरह हमें नियमित रूप से आ रहे सूखा से निजात मिलेगी। 

सरकार का नज़रिया
प्रधानमंत्री ने 2022 तक किसानों की आय दोगुना करने का वायदा किया है। इस वायदे की भी पड़ताल जरूरी है । “राष्ट्रीय पतिदर्श सर्वेक्षण संगठन” के अनुसार 2003 से 2013 तक आते-आते खेती में आय ₹1060 से बढ़कर ₹3844 प्रतिमाह हो गयी। खेती में आय 13.7 फ़ीसदी सालाना की दर से बढ़ी। यह तब है जब इस दशक में प्राकृतिक आपदा और सूखा अपेक्षाकृत कम रहीं हैं। मनरेगा ने भी ग्रामीण इलाकों में लोगों की आय में इजाफा किया। किसानों की 2022 तक दोगुनी आय के  लिए खेती में आय 15 फीसदी प्रतिवर्ष की दर  से बढ़नी चाहिए। जोकि पिछले रिकॉर्ड को देखते हुए कोई नया करिश्मा नहीं है। जो रफ़्तार अभी है उसी से वे 2022 तक दोगुनी आय तक पहुँच जाएँगे। 


 साथ-साथ बढ़ती मँहगाई किसानों की कमर तोड़ती रहेगी। 2022 तक किसानों की आय दोगुनी हो भी जाय तो तब तक उनका बिजली बिल भी दोगुना हो जायेगा, पढ़ाई का खर्चा दोगुने से भी ज्यादा हो जायेंगे । दवाइयों की कीमत दोगुनी होजायेगी। आने जाने का किराया दो गुना होजायेगा। यानी किसानों को 2022 तक दोगुनी आय से कोई भला नहीं होने वाला। बस आँकड़ों के बाजीगर दोगुनी आय का गाना गाकर राजनीति चमका रहे हैं।

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