पर्यावरण एवं जलवायु संकट और नीति निर्धारको की भूमिका

विगत 18 जून को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 41 कोयला खदानों की नीलामी को शुरू करते समय कहा कि इस परियोजना से 225 मिलियन मेट्रिक टन कोयला का उत्पादन, 2.8 लाख लोगों को नौकरी और 33 हजार करोड़ रूपये का निवेश होगा।परन्तु 41 कोयला खदानों की सूची से पता चलता है कि मध्य भारत के जैव विविधता से समृद्ध जंगल क्षेत्र में यह खदान स्थित है।जिसमें सबसे बङे घने जंगलों में से एक छत्तीसगढ़ का हसदेव अरण्य नामक जंगल है, जो 1 लाख 70 हजार हैक्टर क्षेत्र में फैला है।
मध्यप्रदेश की  गोंटीटोरिया ईस्ट कोल ब्लॉक में 80 प्रतिशत जंगल है और वहां से सीता रेवा नदी भी गुजरता है।भारत में 72 करोड़  मेट्रिक टन कोयला का उत्पादन प्रतिवर्ष  होता है और 24 करोड़ मेट्रिक टन कोयला का आयात किया जाता है जो कोकिंग कोल के रूप में उद्योगों के लिये इस्तेमाल होता है।97 करोङ मेट्रिक टन कोयला  की उपलब्धता के विरुद्ध खपत 88 करोड़ मेट्रिक टन होता है यानी 9 करोड़ मेट्रिक टन सरप्लस है।भारत में 14 हजार 800 करोङ मैट्रिक टन कोयला का भंडार है।कोल इंडिया के दृष्टिपत्र 2030 के अनुसार देश में 150 करोड़ मेट्रिक टन कोयले की आवश्यकता होगी।
जब दुनिया में कोयला खपत कम करने की ओर बढ़ रहा है तब भारत अपने कोयला  उत्पादन क्षमता को बढाने की दिशा में जा रहा है।खान एवं खनिज अधिनियम 1957 व कोयला खनन राष्ट्रीयकरण अधिनियम 1973 में संशोधन कर  कोयला खनन विशेष प्रावधान अधिनियम 2015 लाया गया था।परन्तु कोल बलाॅक को निजी हाथों में देने के लिये फिर इस वर्ष संशोधन कर खनिज कानून संशोधन अधिनियम 2020 पारित किया गया है। क्या हमें इस विकास की अंधी दौड़ से निकलने के बारे नहीं सोचना चाहिए?जबकि विश्लेषण के अनुसार  स्थिति विकराल रूप लेते जा रही है।जिसका प्रतिकूल असर आदिवासी एवं वंचित समुदाय और गरीबों के उपर ज्यादा हो रहा है।देश की स्वतंत्रता से लेकर अबतक अनुमानित 10 करोड़ लोग विभिन्न विकास परियोजनाओं से विस्थापित हुए हैं।
जिसमें से 1 करोड़ 20 लाख लोग अकेले कोयला खनन से प्रभावित हुए हैं और इसमें 70 प्रतिशत आदिवासी आबादी है। ग्लोबल फारेस्ट रिसोर्स असेसमेंट रिपोर्ट 2020 और संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) द्वारा 13 मई 2020 को जारी रिपोर्ट के अनुसार 236 देशों में 1990- 2020 के दौरान वनों से सबंधित 60 कारकों के जरिये वनों की स्थिति और ट्रेंड्स की पङताल की गई है।रिपोर्ट के अनुसार 1990 से 2020 तक दुनिया भर में 178 मिलियन अर्थात 17 करोड़ 80 लाख हैक्टेयर वन कम हुआ है।वनों को पहुंचा यह नुकसान लीबिया देश के क्षेत्रफल के बराबर है।
भारत में कुल जमीन 32 लाख 87 हज़ार  263 वर्ग किलोमीटर है यानी 32.87 करोड़ हैक्टर है।इंडियन स्टेट आफ फारेस्ट रिपोर्ट 2019 के अनुसार 7 लाख 67 हजार 419 वर्ग किलोमीटर भूमि वनक्षेत्र है। पर्यावरण मंत्रालय अपना रिपोर्ट पेश करते हुए दावा करता है कि विश्व की 17 प्रतिशत आबादी,18 प्रतिशत पशुधन की उपलब्धता और 382 जनसंख्या घनत्व के साथ भारत का जंगल सबसे ज्यादा क्षेत्रफल के मामले में ठीक ठाक रहना बङी उपलब्धि है।कुल वन  एवं वृक्षारोपण क्षेत्र 8 लाख 2 हजार 88 वर्ग किलोमीटर के साथ भारत विश्व में 10 वें स्थान पर आ गया है।परन्तु फारेस्ट सर्वे आफ इंडिया की रिपोर्ट 30 दिसंबर 2019 के अनुसार 2 लाख 26 हजार वर्ग किलोमीटर में जंगल नहीं है है।
इसका मतलब यह है कि इंडियन स्टेट आफ फारेस्ट रिपोर्ट 2019 मे दिये गये आंकड़े  के अनुसार 29.5 प्रतिशत भूमि में वन नहीं है।मंत्रालय की अन्य वेवसाइट ई ग्रीन के अनुसार 2014-15 से 2018- 19 की अवधि में 72 हजार 685 हैक्टेयर वनभूमि गैर वन गतिविधियों के लिए हस्तांतरित हुई है।लोकसभा में सवाल का जवाब देते हुए वन,पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन राज्य मंत्री बाबुल सुप्रियो ने कहा कि 2014 से 2019 के बीच सरकार ने 1 करोड़ 9 लाख 75 हजार 844 पेड़ो को काटने की अनुमति विकास परियोजनाओं के लिए दिया गया है।पर्यावरण मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार वन संरक्षण अधिनियम 1980 के लागू होने के चार दशक बाद 27 हजार 144 विकास परियोजनाओं के लिए लगभग1.51मिलियन यानि 15 लाख 10 हजार हैक्टर वनभूमि दिया गया है।जो राजधानी दिल्ली के क्षेत्रफल के दस गुणा है।वर्तमान केंद्र की सरकार कारपोरेट और कंपनियों के व्यापार को सुगम करने के लिए पर्यावरण प्रभाव निर्धारण प्रकिया 2020 लाकर कानून को कमजोर करने की तैयारी कर लिया है।
भारत का कुल भौगोलिक क्षेत्र 32.87 हैक्टर है और आंकड़े बताते हैं कि 9.64 हैक्टर भूमि (लगभग 30 प्रतिशत) या तो मरूस्थल हो चुकी है या होने वाली है।देश के सुखा प्रभावित 78 में से 21 जिले ऐसे हैं जिनका 50 फीसदी से अधिक क्षेत्र मरुस्थलीकरण में बदल चुका है।खेती में उपयोग किये जाने वाले रसायनिक खाद,कीटनाशक आदि के कारण 5 हजार 344 मिलियन टन मिट्टी का भू क्षरण प्रतिवर्ष होना भी एक कारण है।भारत के कुल मरूस्थल का 82 प्रतिशत हिस्सा केवल आठ राज्यों राजस्थान, महाराष्ट्र, गुजरात, जम्मू एवं कश्मीर, कर्नाटक,झारखंड, उड़ीसा, मध्यप्रदेश और तेलंगाना में है।दूसरी ओर हर वर्ष देश में लगभग 190 घन किलोमीटर भूमिगत जल निकाला जाता है और वर्षा आदि से जितना पानी भूमि के अंदर जाता है उसकी मात्रा 120 घन किलोमीटर है अर्थात 70 घन किलोमीटर की कमी हर साल हो रही है।
भारत में 70 हजार 776 ग्रामीण इलाके के 47 करोड़ 40 लाख आबादी भूमिगत जल पर निर्भर है।परन्तु भूमिगत जल में फ्लोराइड, आर्सेनिक, हेवी मेटल,खारापन आदि के कारण स्वास्थय पर विपरीत असर हो रहा है।जबकि बोतलबंद पानी का कारोबार 10 हजार करोड़ और पानी साफ करने वाली मशीनों का कारोबार 3 हजार करोड़ का बताया जाता है।केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आंकड़ों के मुताबिक 2015 में नदियों के 32 हिस्से (एस्ट्रेच) प्रदुषित था,जो 2018 में बढ़कर 48 हो गया है।टाइम्स ऑफ इंडिया की 29 जून 2010 की रिपोर्ट अनुसार भारत में लोगों द्वारा 20 लाख टन कचरा प्रतिवर्ष पानी में बहाया जाता है।
ग्लोबल रिस्क इंडेक्स 2020 के अनुसार 1998 से 2017 के बीच जलवायु परिवर्तन के कारण (सुखा,बाढ,तुफान आदि) 5 लाख 99 हजार करोड़ का नुकसान हो चुका है।जबकि 2018 में जलवायु परिवर्तन से आर्थिक नुकसान 2 लाख 79 हजार करोड़ और 2081 लोगों की मौत हो चुका है।लांसेट के अध्ययन अनुसार 2017 में वायु प्रदूषण से 12 लाख लोगों की मृत्यु हुई है जिसमें से एक लाख बच्चे 5 वर्ष से कम आयु के हैं।ग्रीनपीस के अध्ययन मुताबिक दुनिया के 30 सबसे प्रदूषित शहरों में से 22 शहर भारत के हैं।नई दिल्ली विश्व की सबसे प्रदूषित राजधानी है।
निर्माण कार्यों में पर्यावरण और प्रकृति को अड़ंगा माना जाता है।जिसके कारण एक ओर पर्यावरण बिगड़ रहा है दूसरी ओर प्राकृतिक  संसाधनों का तेजी से दोहन हो रहा है।वैज्ञानिक शोध से पता चलता है कि पृथ्वी की जलवायु बदल रही है।परिवर्तन की गति सभी अनुमानों से ज्यादा है।इसका कारण है कि औधोगिक विकास के लिए कोयला और पेट्रोलियम जलाने से निकलने वाला कार्बन का धुआं। इसकी चेतावनी 1988 से वैज्ञानिक दे रहे हैं और इस वैश्विक चिंता के कारण 2015 में जलवायु पर पेरिस समझौता हुआ था।इस अंधाधुंध विकास के कारण हमारे आसपास की हवा,पानी और मिट्टी की गुणवत्ता लगातार खराब हो रहा है।यह पुरी तरह साफ हो गया है कि मानवीय दखल भरे इस युग में पर्यावरण को अबतक की सबसे भारी क्षति पहुंची है।

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