बेमौसम बारिश और तेन्दू पत्ता से जुड़ी आजीविका का संकट

झारखंड जैसे राज्य में तेन्दु पत्ता जंगलों में रहने वाले आदिवासी परिवारों के लिए आजीविका का प्रमुख श्रोत है। बीतें दिनों हुई बेमौसम बारिश ने झारखंड के ग्रामीण और जंगल के इलाक़े की आजीविका पर बुरा असर छोड़ा है। तेन्दु पत्ता से परिवार का भरणपोषण करने वाली ज़्यादातर आदिवासी परिवार बेमौसम बारिश की वजह से लगभग अब बेरोज़गारी के क़रीब है। तेन्दु पत्ते से जुड़ी अजीविका का संकट गहराता जा रहा है, और सरकारी मदद के नाम पर अबतक कुछ भी नहीं मिल पाया है। बेमौसम बारिश के बाद जंगलों में अजीविका के गहराते हुए संकट को लेकर जेम्स हेरेंजसंयोजकझारखण्ड नरेगा वाच ने गढ़वा ज़िला के कुछ आदिवासी परिवारों से बातचीत की है। 

गढ़वा जिला अन्तर्गत रमकण्डा प्रखण्डहोमिया गाँव की रहने वाली आदिम जनजाति अनिता देवी का परिवार बहुत आशन्वित और पारिवारिक खर्चों के प्रबंधन को लेकर काफी संतुष्ट था। उनके संतुष्टी का कारण भी बहुत स्पष्ट था। जब इस वक्त देश में बेरोजगारी की दर इतनी भयावह हो गई है तब भी यह परिवार सुदूर वन क्षेत्र में रहने के बावजूद पिछले एक सप्ताह से प्रतिदिन 600 रूपये कमा लेता था। वह भी इतनी सहजता से जिसका अंदाजा किसी को नहीं होगा।

सुबह वगैर नास्ते के पास के जंगलों में निकल जाते थे, वहाँ बीड़ी पत्तों को संग्रहण करते थे, फिर 11 से 12 बजे के बीच वापस घर आकर मुँह धोते और खाना खाकर संग्रहित किये गये पत्तियों को पूरे दोपहर में 50-50 पत्तियाँ गिनकर बंडल बाँधते थे। शाम को धूप कम होने पर उसे गाँव में ही निजी खरीददारों को बेच देते थे, उसके बदले उसे तुरन्त हाथों में नगद भुगतान मिल जाती थी। अनिता और उनके परिवार के सदस्य रोजाना करीब 400-500 पोला (50 पत्तियों का एक पोला) पत्ती संग्रहित का बेच रहे थेजिससे लगभग 600 से लेकर 700 रूपये की आमदनी हो जाती थी। लेकिन बेमौसम बारिश से यह रोजगार भी अचानक बन्द हो जाने से उनके चेहरे में फिर से मायूसी छा गई।

यह नकारात्मक परिस्थिति सिर्फ अनिता देवी के परिवार के समक्ष है, परन्तु राज्य के अधिकांश वन आच्छादित इलाकों में निवासरत लाखों ग्रामीण परिवारों के सामने गई है, जहाँ प्रत्येक वर्ष मई के अंतिम सप्ताह से 15 जून तक बीड़ी पत्ता तोड़ने और इसकी खरीददारी का कारोबार होता है। इस कारोबार से लाखों आदिवासी और दलित परिवारों को प्रत्यक्ष रूप से रोजगार मिलता है। इसके साथ ही सरकार को करोड़ों रूपये राजस्व की प्राप्ति भी होती है। ग्रामीण परिवार इसके माध्यम से 5 से 15 हजार तक पैसे कमा लेते हैं। इस पैसे से ग्रामीण खेती के लिए बीज, हल बैल, बरसात में होने वाली बीमारी के दरम्यान दवाईयां और दूसरी तरह की जरूरतों के लिए नगद सुरक्षित रखते हैं।

छत्तीसगढ़ की तुलना में झारखण्ड वनोपज के संग्रहण और इसके व्यवसाय में काफी पीछे है। यहाँ अपने राज्य में जहाँ 100 पोला पत्ती की झारखण्ड राज्य वन विकास निगम द्वारा निर्धारित कीमत महज 120 रूपये दी जा रही है। वहीं बगल के राज्य छत्तीसगढ़ में इतने ही पत्ती की निर्धारित कीमत 500 रूपये है। ऊपर से बोनस की राशि अलग से भुगतान की जाती है। यही कारण है कि गढ़वा जिला के सीमावर्ती गाँवों के बीड़ी पत्ती तोड़ने वाले परिवार अपना पत्ती छत्तीसगढ़ के फड़ों में बेचते हैं।

छत्तीसगढ़ के परिवारों ने यह भी बताया कि यदि बीड़ी पत्ता तोड़ने के लिए 5 किलोमीटर से ज्यादा दूर जाते हैं तो ग्राम पंचायतों द्वारा ट्रैक्टर अथवा छोटे ट्रक मुहैया कराया जाता है। यहाँ झारखण्ड में वैसे आरक्षित वन क्षेत्र जिन्हें विभिन्न वन्य प्राणी संरक्षण परियोजनाओं हेतु अधिसूसूचित किये गये हैं, उन इलाके के गाँवों के लोगों को तो वनोपज संग्रहण के अधिकार भी उनसे सरकारों ने छीन ली है।

अकेले पलामू व्याघ्र परियोजना के अन्तर्गत 199 गाँव हैं, जहाँ बाघ संरक्षण के नाम पर बीड़ी पत्ता तोड़ने सहित अन्य वनोत्पाद संग्रहण की सरकारी मनाही है। यह जनविरोधी नीति उन इलाके में निवास करने वाले परिवरों के जीविकोपार्जन पर सीधासीधा हमला है। जबकि वनक्षेत्र में रहने वाले आदिवासी तथा दलितों के जीविकोपार्जन का मुख्य आधार वनोत्पाद ही हैं।

छत्तीसगढ़ में वन अधिकार मुद्दे पर कार्य करने वाले गंगा राम पैकरा बताते हैं कि यहाँ काँग्रेस का सत्ता में आने की मुख्य वजह वन क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए जनपक्षीय नीतियों की घोषणा रही है। यहाँ वनोपज के संग्रहण एवं खरीदविक्री के लिए पूरे वैधानिक ढाँचे विकसित किये गये हैं। विभिन्न तरह की वनोपजों का कारोबार सहकारी समितियों के माध्यम से की जाती है। प्रत्येक रेंज में 2 से 3 सहकारी समितियाँ निबंधित हैं। इन समितियों पर प्रशासनिक नियंत्रण के लिए वन विभाग अपने कर्मियों में से ही खरीदी मैनेजर नियुक्त करता है।

जिले के अन्दर सभी सहकारी समितियों का एक जिला स्तरीय फेडेरेशन गठित है। जिले भर के लिए लोकतंत्रिक ढंग से नीतिगत निर्णय इसी फेडरेशन में लिये जाते हैं। यहाँ पूरे जिले भर में सहकरी समितियों के माध्यम से किये जाने वाले गतिविधियों और आयव्यय का व्यौरा रखा जाता है। बीड़ी पत्ते के मामले में जहाँजहाँ फड़ खुलता हैवहाँ ग्राम सभा और सहयोग समिति के सदस्य मिलकर फड़ मुन्शी की नियुक्ति करते हैं।

इसी फड़ में बीड़ी पत्ते की खरीदी की जाती है। उन्होने यह भी बताया कि साल का फलपियार का फल दाना सहित अन्य वनोपज भी इन्हीं समितियों के लोग खरीदी करते हैं। वहाँ साल के फल बेचने वालों को भी मुनाफे पर बोनस देने की व्यवस्था है। इससे वनोत्पाद संग्रहण से जुडे़ परिवारों के हितों की रक्षा भी हो रही है और वैसे मुनाफाखोरों को किनारा करने में मदद मिली है जो बीच में लाभुकों से औनेपौने दामों में वनोत्पाद खरीदकर बाजार में ऊँचे मूल्य पर बेचकर बेतहासा मुनाफा कमाते थे। झारखरखण्ड सरकार को भी इस दिशा में समुचित पहल करनी चाहिए।

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