सरकार और जिला प्रशासन की दमनकारी रवैये के खिलाफ सत्याग्रह पर हैं नर्मदा घाटी के डूब प्रभावित

वैश्विक महामारी के बीच दोहरी डूब झेलती नर्मदा घाटी! डूब आने के 20 दिन बाद भी मूल गावों में नहीं पहुंचे जिम्मेदार अधिकारी- न तो जिला कलेक्टर, न ही पुनर्वास आयुक्त और न ही भूअर्जन अधिकारी!

मध्य प्रदेश में नर्मदा घाटी के डूब प्रभावित सरकार और जिला प्रशासन की दमनकारी रवैये के खिलाफ क्रमिक अनशन पर हैं। वैश्विक महामारी के बीच दोहरी डूब की मार झेल रहे नर्मदा घाटी के लोग अवल्दा में आठ तो पिछोडी में 10 दिनों से क्रमिक अनशन पर हैं। दरअसल, नर्मदा घाटी के करीबन 50 गांव पूर्ण रूप से डूब चुके हैं व सैंकड़ो गांवों में पानी घुस गया है। इस आकस्मिक डूब से न सिर्फ जनजीवन प्रभावित हो रहा है बल्कि सैकड़ों साल पुरानी इन गांवो की खेती भी बर्बाद हुई है।

जलस्तर बढ़ने से किसानों की खड़ी फसल और जो भूमि अर्जित नहीं हुई है, ऐसी खेती में, चारों तरफ से पानी के आने से व खेतों तक पहुंचने का रास्ता बंद होने के कारण लाखों किसानों की मेहनत व फसल बर्बाद हो गई है।

मनावर तहसील का एकलबारा गांव हो या सेमलदा गांव, इन गांवों की हजारों-हजार एकड़ जमीन पर खड़ी फसल जिनमें आज जाने के रास्ते नहीं बचे हैं, बर्बाद हो रही है। 

आज कवठी गांव के 27 किसानों की जमीन डूब गई। इन किसानों को सर्वोच्च अदालत के आदेशानुसार 60 लाख रुपये जमीन के बदले मिलना चाहिए था लेकिन आज तक नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण द्वारा नही दिया गया है जबकि ओमप्रकश और श्रीराम पाटीदार की सात हेक्टेयर संपूर्ण जमीन आज डूब चुकी है। खेत में मक्का की फसल बोई हुई थी लेकिब वह इस बार फिर डूब गई आज दोनों भाई भूमिहीन हो गए हैं। आजीविका का कोई भी साधन नहीं बचा है जबकि शिकायत निवारण प्राधिकरण द्वारा भी दोनों भाइयों को 60 लाख का आदेश प्राप्त हुआ है। आज दोनों भाइयों की स्थिति काफी गंभीर बनी हुई है। लेकिन अधिकारियों के पास न कोई ठोस जवाब है न ही कोई निर्णय लिया जा रहा है।

लाखों लोगो की बर्बादी को सरकार व जिला प्रशासन कर रही अनदेखा

आज की स्थिति में जब जल स्तर 135 मीटर है, नर्मदा घाटी के लगभग हर गांव तक पानी पहुंच चुका है। लेकिन न तो नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण के पुनर्वास आयुक्त, भू-अर्जन अधिकारियों ने मूल गांव पहुंच कर क्षेत्र का जायजा लिया है बल्कि मीडिया द्वारा लगातार प्रभावित लोगों की स्थिति को उजागर करने के बावजूद प्रदेश सरकार व बड़वानी, धार, अलिराजपुर, खरगोन के जिला प्रशासन ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है| बहुत ही शर्मनाक बात है कि इस वैश्विक महामारी के दौर में जहां पिछले ही साल की डूब से नर्मदा घाटी के लोग अभी तक उभर न पाए हैं, ऐसे में सरकार व जिला प्रशासन ने इस दोहरी डूब को झेलने के लिए लाखों किसानों, मछुआरों, आदिवासियों, केवाठों, पशुओं, जीवंत फसल को अपने हाल पर छोड़ दिया है!

सरकार व जिला प्रशासन की तरफ से किसी भी तरह की मदद या आश्वासन न मिलने पर डूब प्रभावितों द्वारा गाांव-गांव में क्रमिक अनशन सत्याग्रह शुरू किया गया। ऐसे में, जिला प्रशासन द्वारा जबरन पुलिस बल के द्वारा सत्याग्रह पर बैठे लोगों को उठाया गया और डूब प्रभावितों पर केस दर्ज किए गए। इस अन्यायपूर्ण घटना की हम नर्मदा घटी के लोग कड़ी निंदा करते हैं। 

साल भर पहले डूबे मकानों के परिवारों को जबरन टिनशेड में पुलिस बल के द्वारा ले जाया गया था उनको न तो आज तक अपने पुनर्वास के अधिकार मिले हैं और न ही पिछले 10 महीनों से उनके लिए कोई व्यवस्था की गई है। डूब प्रभावित परिवार 10/10 के पथरे के टीनशेड में रहने को मजबूर है जिन्हें आज तक पुनर्वास स्थल पर भूखंड नही मिले हैं। पिछले साल की डूब में आए कई मकानों की भू-अर्जन की राशि हो या डूब के दौरान बने पंचनामों पर आज तक भी कोई कार्रवाई नहीं की गई। नर्मदा घाटी के सभी डूब प्रभावित यह मांग करते हैं कि सरकार व जिला प्रशासन दमन की नीति न अपनाते हुए संवाद की दिशा में कदम उठाए और सभी प्रभावितों का पूर्ण पुनर्वास सुनिश्चित करे।

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