गंगा का पलायन मोकामा के लिये अभिशाप है !

तस्वीर Versial Aunta के फेसबुक से साभार ली गयी है।
हाथीदह-मोकामा से गंगा पलायन किया जा रहा है, जिसे लेकर स्थानीय लोग आंदोलन कर रहे हैं।
मोकामा से 191 किलोमीटर पाइपलाइन के सहारे गंगा नदी का पानी मोकामा से नालंदा, गया, राजगीर लेकर जाया जा रहा है।प्रोजेक्ट की कीमत 3 हजार करोड़ रुपये है। जिसे रिवाइज़ कर 5 हजार करोड़ किया जायेगा।इस प्रोजेक्ट की घोषणा पिछले साल 2019 में अगस्त सितंबर के महीने हुई और साल भर के अंदर युद्ध गति से काम होने लगा। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार खुद इसकी देख रेख कर रहे हैं।
प्रोजेक्ट की “इंपैक्ट स्टडी” पब्लिक नहीं की गयी है। स्टडी हुई भी है या नहीं इसपे शंका है। प्रोजेक्ट का ब्लू प्रिंट सामने नहीं आया है और मोकामा गंगा के इलाकों में पूरे भारत में सबसे अधिक “गंगेटिक डोलफिंस्” हैं अगर स्ट्रीम डिस्टर्ब हुई तो इसकी वजह से  “एक्वेटिक लाइफ” पे बुरा असर होगा।
मोकामा का ग्राउंड वॉटर लेवल गया,नवादा इत्यादि जिलों से काफी कम है। उसके बावजूद मोकामा में 120 फीट बोर करके पानी ले जाये जाने से ‘ग्राउंड वाटर’ और ‘कृषि कार्यों’ पर नेगेटिव इंपैक्ट होगा क्योकी मोकामा में गंगा के दक्षिण में एशिया का सबसे बड़ा फार्मलैंड टाल है जो इस प्रोजेक्ट के बाद प्रभावित हो सकता है, जिस वजह से इस इलाक़े के हज़ारों किसान और किसानी के कामों में लगे मजदूरों को भारी नुक्सान होने की संभावना है।
सरकार कहती है बरसात के दिनों में जब पानी अधिक होगा तब लगातार 3 महीने पानी सप्लाई करेंगे। कुल 270 मिलियन क्यूबिक फिट के तीन डैम में पानी स्टोर होगा, जबकि नालन्दा जिला बरसात के दिनों में स्वयं डूबा रहता है। 2016 में आई बाढ़ देखें। साथ ही गंगा जी की स्थिति क्षणभंगुर है। 2 महीने पानी रहता है, उसके अगले महीने पानी सूख जाता है।
गंगा पलायन से नदी बेसिन में “सिल्टिंग और सेडिमेंटेशन्” होगा।जिसको साफ करवाने के लिये विशेष कवायद करनी होगी,अन्यथा मोकामा क्षेत्र में बाढ़ आने की सम्भावना बढ़ जाती है। क्षेत्रीय लोग परेशान है, क्युकी मोकामा टाल में भी सिल्टिंग से गाद जमा होने की समस्या से बुआई नही हो पाती है। कलकता से वाराणसी 14 दिनों की गंगा ट्रिप से पर्यटन की सुविधा है, जिसको लेकर अडानी ग्रुप और भारत सरकार पिछले 2 सालों से 40*10 मीटर चैनल निर्माण कर रही है। सेडिमेंटेशन् की वजह से आये दिन रोज जहाज फंस जाता है।

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