देश को स्वच्छ ऊर्जा देने की समय-सीमा से चूक जाएंगे कोयला पावर प्लांट्स! ये है वजह

The CSEB Hasdeo Power Plant is one of the most polluting TPPs in the city of Korba. Some locals and plant insiders allege that the plant turns its ESP (Electrostatic Precipitators) off at night mostly, which leads to tremendous levels of pollution coming out the TPP. Credit Greenpeace

पर्यावरण सचिव आरपी गुप्ता ने इकोनॉमिक टाइम्स से कहा, ‘कोरोना महामारी पर वास्तविक चिंताओं और चीनी पुर्जों पर रोक लगाने के भारत के प्रयास के मद्देनजर पर्यावरण मंत्रालय योग्य कोयला पावर प्लांट्स को प्रदूषण नियंत्रण के उपाय लागू करने में रियायत देगा। उन्होंने कहा, ‘मांगें वास्तविक हैं लेकिन हमें इस पर विचार करने की आवश्यकता होगी कि कितनी रियायत दी जाए। निर्णय लेने से पहले रियायत के लिए पात्रता मानदंड, चाहे रियायत के अलग-अलग स्तर हों- उचित विश्लेषण और परामर्श के बाद इन सब पर चर्चा करने की आवश्यकता है।’

सूत्रों ने बताया कि बिजली मंत्रालय ने अगस्त महीने में पर्यावरण मंत्रालय को पत्र लिखकर 100 गीगावाट क्षमता वाले करीब 330 यूनिट्स के लिए वर्तमान समय-सीमा में दो साल का विस्तार करने की मांग की। इसमें इस बात की चर्चा की गई है कि पहले सामान्य परिस्थितियों को देखते हुए वर्तमान समय-सीमा को तय किया गया था।

सूत्रों के मुताबिक, बिजली मंत्रालय ने पर्यावरण मंत्रालय को सूचित किया है कि 70% थर्मल पावर स्टेशन दिसंबर 2022 की समय-सीमा से चूक जाएंगे। ऐसे में केंद्र, राज्य और निजी क्षेत्र के बिजली उत्पन्न करने वाली यूनिट्स ने समय-सीमा में विस्तार की मांग की है। बिजली मंत्रालय ने अपने पत्र में लक्ष्य की तारीख को दो साल बढ़ाकर दिसंबर 2024 करने की मांग की है। बिजली मंत्रालय ने कोरोना महामारी के बीच घरेलू बिजली उपकरणों की अनुपलब्धता और वित्त की कमी का हवाला देते हुए दिसंबर 2022 की समय-सीमा के लक्ष्य को हासिल करने में असमर्थता जाहिर की है।

गुप्ता ने कहा, ‘उत्सर्जन मानदंडों का पालन करने के लिए थर्मल पावर प्लांट्स को जो समय-सीमा दी गई है, वह घरेलू विनिर्माण पर जोर और कोरोना महामारी से उत्पन्न व्यवधान के कारण प्रभावित हो सकती है। ऐसे में पर्यावरण चिंताओं और वर्तमान परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए कुछ रियायतें दी जा सकती हैं।’ हालांकि, उन्होंने कहा, बिजली मंत्रालय द्वारा किए गए अनुरोध पर अभी तक कोई निर्णय नहीं लिया गया है।

गुप्ता ने कहा, ‘निर्णय लेने से पहले आंकड़ों का विश्लेषण और प्रगति का आंकलन करना होगा और इसके लिए पर्यावरण मंत्रायल को अन्य मंत्रालयों और प्रदूषण नियंत्रण उपकरण के घरेलू निर्माताओं के साथ परामर्श करने की आवश्यकता होगी।

यह देखा जाना बाकी है कि पर्यावरण मंत्रालय बिजली मंत्रालय द्वारा सुझाए गए सभी बिजली परियोजनाओं को विस्तार की मंजूरी देगा या नहीं। पर्यावरण मंत्रालय ने 2015 में उत्सर्जन नियंत्रण मानदंड जारी किए और 7 दिसंबर 2017 की समय-सीमा तय की, जिसके खिलाफ बिजली मंत्रालय ने सात साल का समय मांगा था।


एसोसिएशन ऑफ पावर प्रोड्यूसर्स के डायरेक्टर जनरल अशोक खुराना ने कहा, ‘वित्तपोषण, परिणामी टैरिफ में वृद्धि व अन्य समस्याओं का सामना कर रहे डेवलपर्स की परेशानियों को बिजली मंत्रालय ने चिन्हित किया। इसके साथ-साथ मंत्रालय समय-सीमा बढ़ाने की सिफारिश करने को सहमत हो गया है। इसके लिए हम उसके शुक्रगुजार हैं।’

पावर प्लांट्स अगले साल तक उत्सर्जन नियंत्रण उपकरण लगाने के चरणबद्ध योजना पर सहमत हुए थे। ऐसे न होने पर पावर प्लांट्स को बंद करने की बात हुई थी। पावर प्लांट्स में सल्फर डाइऑक्साइड के उत्सर्जन को कम करने वाले फ्लू गैस डिसल्फराइजेशन (एफजीडी) यूनिट्स को लगाने को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने जून में लंबा विस्तार देने से इनकार कर दिया था।

सूत्रों के अनुसार, जबकि स्थानीय निर्माता उपकरण की आपूर्ति कर सकते हैं, उत्सर्जन नियंत्रण के उपायों को लागू करने में बहुत अधिक नागरिक कार्य शामिल हैं और इसके लिए उन्हें एक बड़े ईपीसी ठेकेदार आधार की आवश्यकता होगी।

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